Discussion on Democracy and Rights
सुबा जब मैं उठाना सर अपनी चोपड़ी में पॉन खोला तो ऐसा लगा
कि ये सरकार मतलब पूरी तरीके से तानसाही पे उतर गई।
मैं कहता हूँ लोकतंत्र में न एहंकानी समवाद होना चाहिए
और समवाद के धर्वाजे दोनों तरफ चे खुले होने चाहिए।
मैं कहता हूँ लोकतंत्र में न एहंकानी समवाद होना चाहिए
और समवाद के धर्वाजे दोनों तरफ चे खुले होने चाहिए।
मैं कहता हूँ लोकतंत्र में न एहंकानी समवाद होने चाहिए
और समवाद के धर्वाजे दोनों तरफ चे खुले होने चाहिए।
मैं कहता हूँ लोकतंत्र में न एहंकानी समवाद के धर्वाजे दोनों तरफ चे खुले होने चाहिए।
लोकतंत्र में आस हमेदी रखना। कोई अपराज नहीं है
बारतिय समिदान तो तो लोकतांत्रिक भेवास्ता में हमें अभी वेक्ती का मौलिक अधिकार है
ये लोकत सिमटते जा रहा है
मैं जंतर मंतर पे ऐसे बात के आया कि
जब जादी की दिक्के ने कहा ना मुझे पीटा और वो रोने लगे
मैं कहा यार मुझे भी पीटना चाहिए
मेरे शरीर की महात पैसे अब मेरी हाथमां से लड़ने लग गई
कैसे ख़ड़े हो, कैसे बेटे हो चुक्की के अंदर चलो यार किताई खाएंगे दिल्ली पुलिस की
नवेले कमिशनर आए है बडे जोसमे आए है बहुत बड़ी दिवसता है,
तकत और धन बल और बड़ी दिवसता है अनकी बढ़ा भारेंगे चलो मार खाएंगे उनकी
यह नहीं है लोकंत का यह रद्धा नहीं है लोकंत में समाद होना चाहिए
कोई आप से सहना तो हो या ना हो
टाइबिल दोनों के लिए आईये बात करते हैं कुछ गलत फेमियातों से दूर करते हैं
इसमें कोई बुरायी नहीं है लेकिन
किसी कोई किसी के
उसको मालित करना
आये उठाये कमड़ा ढखा ले गए उठा लिया कपर चलाधी
वांचजु को उठा लिया
आतंग मती था
पदमाद था मुण्डा था इस जेस का महान परेवारां अक्टिविस्ट था सिख्षाविक था दुनिया का अंपास नागरिक था
कितना अविसकार की है भारती जेनक लिया जेस के लिए
महान साहिंटिस था उठा लिया
इस हंदोलन से हमाँ हंदोलन से हमारी आत्मा शुट जाती है
हम जन संगर्श से पेदा वेवे लोग हैं हमने स्कूल और कितावों का ज्यान नहीं है
हमारे बाद जो बोल रहे हैं वो चीवन से जुला है आत्मा रो पड़ी
रो पड़ी संग समझ रहे हैं जब हम उस लाइन को पढ़ते हैं कि People of India
हम भारत के लोग भारत को संपन पभु संपन समात्वादी धर्म निर्पेख नहीं थी
वेक्ति की घरीमा राश की हेक्ता और अखनता को सुनिचित करने वाली बहुत्ता को बढ़ा नहीं थी।
जीड़ संगल लोगों के 26 नुमबर उन्हें सुनन साथ को अंकीत धिनियम और आत्म समत्मिद करते हैं
वेक्ति की घरीमा राश की हेक्ता और अंकीत धिनियम और आत्मिद करते हैं
बहुत पूरी देश में अलग राशों में अलग शमीकार और अलग नूटं महसूरी हैं
कही एक नहीं मिलती जाहन लागूया वो भी नहीं मिलती
आप पूरी तरह से ज़वानों के लेंजर में फैलने मैं अपनी आप समयती रहता हूं
बोलूंगा आज मेरी ज़वान कप कप आ रही है
पता नहीं बहुत बोलता हूं सर मैं लेकिन कहते हैं
ना इतना तोड़िये मत लो इतना कमजोर मत लो
End of transcript · 500 words