संस्कृति की रक्षा और राष्ट्र की एकता का आह्वान
पराजित राष्ट्र तब तक पराजित नहीं होता जब तक वह अपनी संस्कृति
व मूल्यों की रक्षा कर पाता है।
पर क्या धर्म व जाति के नाम पर खंड खंड में बंटा यह राष्ट्र
आक्रांताओं से अपनी संस्कृति की रक्षा कर पाएगा?
यदि आक्रांताओं को इस धरती पर स्थिर होना है तो उन्हें व्यक्ति से व्यक्ति को
जोड़ने वाली संस्कृति पर आक्रमण करना होगा और वे करेंगे। यदि हम
सावधान नहीं हुए तो
और यदि हमने अपनी सांस्कृतिक विरासत को छोड़ा तो हमारा पतन निश्चित है।
अनुभव कहता है कि पराजित मन, पराजित राज्य व पराजित राष्ट्र
प्रायः विजेता के संस्कार व संस्कृति को स्वीकार करते हैं।
इसलिए यदि शीघ्र ही इस राष्ट्र की सुप्त चेतना को जागृत नहीं किया गया, इस
राष्ट्र को संगठित नहीं किया गया तो इस राष्ट्र को अपने राष्ट्र को विधर्मी
दासता से मुक्त करना कठिन हो जाएगा। विद्या ही मुक्ति
का मार्ग दिखाती है
और यदि वही असमर्थ है आज तो वह व्यर्थ है।
जन्म मरण के बंधन से भी मुक्ति चाहने वाले भारतीय क्या यवनों का बंधन स्वीकार
करेंगे?
आप आज्ञा दीजिए आचार्य! हम बंधनों से मुक्त होने के लिए तैयार
हैं।
हर हर महादेव।
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