Facial Recognition and Protest Controversy
पहले एक दावा headline बना। Delhi Police के facial recognition system
ने जंतर मंतर के student protest में
2873 ऐसे लोगों को पहचान लिया
जिनके चेहरे Police criminal database से match हो रहे थे।
दावा चौंकाने वाला था क्योंकि इसमें murder, rape, attempt to
murder के आरोपी भी थे। फिर एक असंभव
दरार दिखाई दी। इनमें से कई लोग protest के वक्त
protest में नहीं, जेल में थे। द इंडियन एक्सप्रेस ने
गंभीर मामलों के 205 नामों की जांच की। कम से कम पच्चीस
लोग उस समय जेल में थे। murder case के सत्रह, rape cases
के चार और attempt to murder cases के चार आरोपी।
यानी algorithms ने व्यक्ति को उस समय जेल में भी
रखा और जंतर मंतर की भीड़ में भी पहचान लिया।
Supreme Court ने student protest के खिलाफ FIR quash कर दी लेकिन इन
2873 लोगों के विरुद्ध verified
evidence मिलने पर कार्रवाई की गुंजाइश छोड़ दी। दिल्ली Police ने
कहा है कि केवल facial recognition match के basis पर action नहीं होगा,
पहले field verification होगी। लेकिन यही कहानी technology से आगे
चली जाती है। verification से पहले
2873 criminals का narrative फैल चुका
था। उसने protest और protesters की public image को नुकसान
पहुंचा दिया था। अब इस नुकसान की verification कौन
करेगा? यह सिर्फ accuracy का मामला नहीं है。
surveillance, due process और protest के लोकतांत्रिक
अधिकार
का सवाल है। algorithm investigation को lead दे
सकता है, evidence नहीं। मशीन शक का संकेत दे
सकती है। किसी नागरिक को अपराधी घोषित करने का अधिकार नहीं
दिया जाना चाहिए।
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