Activism and Social Justice in India

अहंकार किस बात का?

अरे अकड़ना तो मुर्दों की पहचान है, हर पल अकड़ते हैं।

हर पल अकड़ते हैं। लेकिन एक जिंदा आदमी अगर ज्यादा देर खड़ा रहे ना, तो झुकने लगता है।

नहीं होता खड़ा। इंसान की, जिंदगी की पहचान है कि वो झुक जाता है।

मैंने जब करीब से देखा तो गोरों ने गांधी जी से बात करी।

वो हमारे नहीं थे, वो दूसरे देश से आए थे, इस देश में शासन कर रहे थे।

हम गुलाम थे, फिर भी उन्होंने हमसे बात करी।

उन्होंने हमसे बात करी और इस बात के लिए मनाया कि आप मान जाइए।

हंगर स्ट्राइक छोड़ दीजिए, भूख हड़ताल छोड़ दीजिए।

ऐसे कई वाकये इस देश में गुजरे हैं जब कोई

एक्टिविस्ट या कोई बुद्धिजीवी वर्ग से आने वाला व्यक्ति सरकार के सामने भूखा बैठ गया और

जिस तरीके से एक बच्चा अपने माता-पिता के सामने "नहीं खाऊंगा, मुझे ये चाहिए या वो चाहिए"

उसकी वाजिब मांगें मां-बाप मानते हैं और जो नहीं मानने की, नहीं मानते हैं।

तो रास्ता तो मां-बाप और बच्चे के बीच में भी आता है।

वही सेम कंडीशन जब हम अपने सरकार के सामने होते हैं, तो सरकार हमारी माता-पिता के रोल में होती है और हम बच्चे के रोल में।

माता-पिता का दिल करुणा और दया, प्रेम और भाव का होना चाहिए, अहंकार का नहीं।

अहंकार किस बात का?

अरे अकड़ना तो मुर्दों की पहचान है, हर पल अकड़ते हैं।

हर पल अकड़ते हैं। लेकिन एक जिंदा आदमी अगर ज्यादा देर खड़ा रहे ना, तो झुकने लगता है।

नहीं होता खड़ा। इंसान की, जिंदगी की पहचान है कि वो झुक जाता है।

दिल्ली पुलिस है ना, जंतर-मंतर पे हमारी सांसों को भी अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहती है।

हमारी सांसों को भी अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहती है।

लेकिन हम दीदी आपके माध्यम से बोलना चाहते हैं

कि हम आपसे नहीं डरते, आपकी पुलिस से नहीं डरते।

हम गांधी के मानने वाले हैं, हम भगत सिंह के मानने वाले हैं जो कहते हैं

कि आप मुझे मार सकते हो, मेरे विचारों को नहीं। आप मेरे शरीर को कुचल सकते हो, मुझे नहीं।

मुझे कुचल सकते हो, मेरी आत्मा को नहीं। समझ रहे हैं?

वो कहते थे कि क्रांति बम और पिस्तौलों से नहीं, विचारों की सान से आती है। समझ रहे हैं?

तो हम विचारों के मानने वाले लोग हैं। हम गांधी के तरीके से 20 तारीख को जाएंगे और मोदी जी के करीब समक्ष होकर खड़े होंगे।

और बोलेंगे, "हे गुरुदेव, बहुत पीड़ा है।"

और जिस वर्ग से मैं आता हूँ दीदी, उस बारे में बताया मैंने।

पता है, मैं उसकी बात आगे कर लूँगा आपसे। बहुत दुःख है, तकलीफ है।

इस दौड़ती, तेजी से दौड़ती अर्थव्यवस्था का लाभ इस देश के चुनिंदा कुछ वर्ग के लोग उठा रहे हैं।

और पूरी आबादी आज भी शोषित, वंचित और पीड़ित है।

हर चीज़ से, हर चीज़ से। मैं इसके बारे में बताऊंगा आपको।

सोच... सोच...

सोच... सोच... सोच...

और मैंने इस अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा तो इस लड़ाई और आंदोलनों में लगाया है।

अब तक आधा हिस्सा इस लड़ाई का हिस्से में लगाया है और मेरी आत्मा आंदोलनों पे रहती है।

End of transcript · 525 words

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