Challenges of Questioning Government Accountability

जब उस कुर्सी पर नहीं थी,

तब ये बात आपसे कह रही हूँ। ये तय जान लीजिए कि सरकार से सवाल पूछना

आसान नहीं है। सत्ता से सवाल पूछना आसान नहीं है।

ये वो दौर नहीं है दरअसल

जब डॉ. मनमोहन सिंह के सामने रिपोर्टर अपना माइक आईडी लगाकर खड़ा हो जाता है,

घोटालों पर सवाल पूछता है और डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं कि मेरे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं।

ये वो दौर नहीं है

जब जसवंत सिंह,

यशवंत सिन्हा सिर्फ नाम आने भर पर

संसद से इस्तीफा दे देते हैं

और संसद की चौखट नहीं लांघेंगे जब तक दूसरे चुनाव में नहीं जीत कर आएंगे,

ये लाल कृष्ण आडवाणी करते हैं।

चाल, चरित्र और चेहरे वाली पार्टी, पार्टी विद द डिफरेंस वाली पार्टी, वो दौर नहीं है।

ये वो दौर नहीं है जब दूरदर्शन पर जनवाणी कार्यक्रम में

लोग सवाल पूछते थे और सवाल पूछने भर से मंत्रियों की

कुर्सियां हिल जाया करती थीं या कुर्सी चली जाया करती थी, वो दौर नहीं है।

तो सरकार से, सत्ता से सवाल पूछना बहुत आसान नहीं है।

ये मैं बड़े यकीन से, बड़े अनुभव से आपको कह रही हूँ। ये दरअसल ट्रोलर्स का दौर है।

आप सवाल पूछेंगे तो स्टूडियो में उत्पाती, हुड़दंगी,

उन्मादी लोगों को भेजा जाएगा।

फिर वो सोशल मीडिया पर अपनी ट्रोलिंग आप पर आजमाएंगे।

ये वो दौर है।

तो सवाल पूछना आसान नहीं है।

और ये जो है, ये संस्थागत पत्रकारिता

बहुत बड़े-बड़े संस्थान जो खुले हुए हैं,

वो उनका दरअसल पहला अघोषित नियम ये है

कि वो जर्नलिस्ट को जर्नलिस्ट तो नहीं रहने देंगे।

वो पत्रकार को पत्रकार तो नहीं रहने देंगे। आप सब कुछ कर पाएंगे, आपके मिलियंस में फॉलोवर्स होंगे,

आपकी बहुत, आप बहुत फेमस हो जाएंगे, आप बहुत मशहूर हो जाएंगे,

पर आप पत्रकार नहीं रहेंगे।

End of transcript · 296 words

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