Importance of Civic Education for Students
नमस्ते।
आजकल सोशल मीडिया पर कभी-कभी लगता है
कि असली मुद्दा कहीं पीछे रह जाता है और नॉइज़ ज़्यादा हो जाती है।
अगर सच में स्टूडेंट्स की फ़िक्र है, तो बात उनके फ़्यूचर की होनी चाहिए,
उनके स्ट्रेस की होनी चाहिए,
उन पर, उनके फ़ैमिलीज़ पर जो बीत रही है, उसकी होनी चाहिए।
सवाल पूछना हर नागरिक का हक़ है,
लेकिन किसी नेता को गाली देना या नाम रख देना सलूशन नहीं है, नीदर इज़ इट मैच्योरिटी।
और एक बात, डिक्टेटरशिप शब्द बहुत कैजुअली यूज़ किया जा रहा है।
डेमोक्रेसी का मतलब सिर्फ़ बोलने की आज़ादी नहीं होती,
डेमोक्रेसी का मतलब है बोलने की आज़ादी के साथ-साथ ज़िम्मेदारी भी।
डिक्टेटरशिप वो होती है जहाँ सरकार के ख़िलाफ़ बोलना ही मुमकिन नहीं है
या उसकी बहुत भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है।
इसलिए किसी भी बात को तुरंत डिक्टेटरशिप कह देना सही नहीं है।
शब्दों का भी एक वज़न होता है।
हम सब अपनी-अपनी राय रख सकते हैं,
सरकार से सवाल भी पूछ सकते हैं
और जब अच्छा काम हो, उसका क्रेडिट देना भी उतना ही ज़रूरी है। यही तो डेमोक्रेसी की ख़ूबसूरती है।
असली हिम्मत ट्रेंडिंग हैशटैग्स में नहीं, असली मुद्दे पर टिके रहने की है।
स्टूडेंट्स के फ़्यूचर की बात कीजिए, सिस्टम से सवाल पूछिए, बिल्कुल पूछिए,
लेकिन शब्दों की गरिमा, सच की ज़िम्मेदारी
और देश के डेमोक्रेटिक वैल्यूज़, तीनों का सम्मान रखिए।
और एक विनम्र रिक्वेस्ट पेरेंट्स से,
अपने बच्चों को सिर्फ़ एकेडमिक्स ही नहीं, सिविक्स भी सिखाइए।
उन्हें डेमोक्रेसी और डिक्टेटरशिप का फ़र्क समझाइए।
फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच के साथ रिस्पॉन्सिबिलिटी ऑफ़ स्पीच भी समझाइए और मैं भी अपने बेटे को यही समझाती हूँ।
हर ओपिनियन को गाली में बदल देना या सिर्फ़ कूल दिखने के लिए कुछ भी बोल देना इज़ नॉट मैच्योरिटी।
असली कूल वही है जो फ़ैक्ट्स जानता हो, सोच-समझकर बात करता हो,
दूसरों का सम्मान करता हो और अपने देश की डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ की भी इज़्ज़त करता हो। जय हिंद।
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