Debate on Employment and E-Rickshaws
योगी आदित्यनाथ जी का मैंने यह बयान सुना।
गिनते जाइए हम नौकरी बांटते जाएंगे। आप गिनते गिनते थक
जाएंगे। हम यूपी के नौजवान को नौकरी देते देते नहीं थकेंगे।
और यह बयान सुनने के बाद मैं तुरंत जल्दी में निकल पड़ा कि कहीं अगर मुझे देर हो
गई तो नौकरियों का अंबार ना लग जाए। लेकिन मैं नौकरी लेने के लिए भाग
ही रहा था कि तब तक मुझे डिप्टी सीएम का यह बयान सुनाई दे गया।
नौकरी चक्कर में पड़ो। अपना चार घंटा चलाओ। दोपहर में लड़की बच्चे से संग हो। भाई
नौकरी दूसरे करोगे तो बच्चों के पास बैठ पाओगे घंटा बताओ ना। बोलो कैसे है लोगों घर
में दो घंटा बच्चों के साथ सोए खाए आराम से फिर निकल गए 10:00 बजे तक के लिए।
और मुझे पता चला कि असल में लड़ाई नौकरी की तो थी ही नहीं। लड़ाई तो ई रिक्शा
चलाने की थी क्योंकि वह आपको आत्मनिर्भर बनाता है। लेकिन फिर मैंने पता
लगाया इनके परिवार में ना तो इनके बच्चे ही रिक्शा चलाते हैं, ना इनके परिवार
का कोई सदस्य ही रिक्शा चलाता है तो। यानी तमाम लोग इनके परिवार में बेरोजगार
हैं। खुद डिप्टी सीएम भी पांच साल की सरकारी नौकरी कर रहे हैं, जिसको बनाए रखने के लिए
इन्हें हर पांच साल बाद वोट मांगना पड़ता है। ऐसी नौकरी किस काम की?
उन्हें भी रिक्शा चलाना चाहिए। इससे आत्मनिर्भरता आएगी और वह किसी से वोट
मांगने के लिए किसी के आगे हाथ नहीं जोड़ना पड़ेगा। जब जी चाहो सुबह रिक्शा उठाओ,
निकल जाओ। दिन भर पैसा कमाओ। 1500 2000 रुपए तो यूं ही आ जाता
है। इस तरीके के बयान के बाद जब ई रिक्शा वालों से पूछा गया तो
उन्होंने खुद यही कहा कि हम केशव प्रसाद को अपना ई रिक्शा देना चाहते हैं।
हम डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को अपना ई रिक्शा देना चाहते हैं। हम मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ को अपना रिक्शा देना चाहते हैं ताकि वो चला के देखें कि इससे असल में कितनी
कमाई होती है।
तैयारी छोड़ो। बढ़िया रिक्शा चलाएं। तगड़ा पैसा है। बहुत तगड़ा रिक्शा है। खुद चलाओ
ना। खुद चलाओ। नहीं नहीं उनसे बोलना। खुद चलाओ। रिक्शा चलाओ। अच्छा पैसा
कमाओ। क्या जरूरत नेताजी की।
इस देश में प्रधानमंत्री कहते हैं छात्रों से पकोड़ा बेचो। डिप्टी सीएम कहते हैं
रिक्शा चलाओ और जब नौकरी मांगने जाओ तो लाठी मिलती है। रोजगार के नाम
पर यह सरकार युवाओं का मजाक उड़ाती है, पेपर लीक करती है। लेकिन
एक नौकरी देने की बजाय यह देश के युवाओं को ई रिक्शा
चलाने की सलाह दे रही है। मगर वही सलाह अपने बच्चों को नहीं देती है।
यह सरकार का दोहरा चरित्र है। आपसे मेरी गुजारिश है कि बृजेश
पाठक जी को टैग करिए और उनसे रिक्वेस्ट करिए कि दो दिन ई रिक्शा चलाएं
ताकि उन्हें पता चले कि ई रिक्शा चलाना रोजगार नहीं मजबूरी
है।
End of transcript · 469 words