Discussion on Kashmir and Political Accountability

कश्मीर के लिए वो जंतर मंतर नहीं गईं।

किसलिए गईं,

इसका स- सवाल का जवाब तो वो खुद देंगी।

लेकिन वहां जाके जो कहा,

जिस तरह यहां

ताकत के गलत इस्तेमाल, गिरफ्तारियां

और इन सब चीज़ों को जस्टिफाई किया,

ये कहते हुए कि

कश्मीर में मिलिटेंसी है तो यहां बनता है।

किस लिहाज़ से बनता है?

क्या क्योंकि यहां मिलिटेंसी है, कानून लागू नहीं होना चाहिए?

मिलिटेंसी है तो यहां बच्चों को इंसाफ नहीं मिलना चाहिए?

मिलिटेंसी है तो लोगों के पासपोर्ट रोक दिए जाने चाहिए?

ये बनता है मैं समझा नहीं।

और चलिए मैं एक सेकंड के लिए वहां के हालात देख के

कुछ लोगों को खुश करने की कोशिश की गई।

वो पुरानी आदत,

यहां पे एक बात और दिल्ली में दूसरी बात, वो आदत गई नहीं।

यानी जब एक बार पता चला कि

जो कहा गलत कहा और लोगों ने उसको ठीक तरह से लिया नहीं,

माफ़ी मांग लेते।

मतलब उनके कद में कोई कमी नहीं आती

अगर वो आप लोगों को इसी तरह बुला के

पार्टी के दफ़्तर में कहतीं कि

मैंने जज़्बात में आके कोई ऐसी बात की जो गलत बात थी और मैं उसके लिए माज़रत-ख़्वाह हूँ, माफ़ी चाहती हूँ।

बजाए ये कि माफ़ी मांगें,

ज़ख़्मों में और नमक छिड़कने की बात।

उनके एक वो एमएलए साहब के थ्रू ये बात कहलवाना कि

ये जी एआई है।

ये एआई का रील है।

अब हम इतने बेवकूफ़ हैं?

मुल्क भर की मीडिया थी वहां पे। उस रील में सारे कैमराज के सामने ये जो आपकी माइकें हैं, वो सारी नज़र आ रही थीं।

एक नहीं, एक से ज़्यादा रील बनी हैं।

अब आप यहां के लोगों की अक्लमंदी को जो है,

आप यहां लोगों को बेवकूफ़ समझते हो, ये कहते हो कि ये एआई है।

ये तो मतलब मैं कहता हूँ बड़े अफ़सोस की बात है।

आपने जो कहा ठीक नहीं कहा, कम से कम इसको तो तस्लीम करिए।

आपने आज तक 2015 के

बीजेपी के साथ अकॉर्ड को जो है, उसकी माफ़ी नहीं मांगी। चलिए ठीक है, नहीं मांगी।

2016 के हालात के आपने कभी उसका

मतलब चलिए माफ़ी तो दूर की बात,

उसके लिए अफ़सोस का इज़हार नहीं किया, चलिए।

आपने दूध-टॉफ़ी की बात की, उसको भी बार-बार जस्टिफाई करने की कोशिश की।

और आज तो दूध-टॉफ़ी को छोड़ के आज तो कहा कि ये तो बनता है।

अब मुसीबत ये है जब

जम्मू-कश्मीर के साबका वज़ीर-ए-आला

ये कहे कि यहां पे ताकत का इस्तेमाल करके लोगों के एहतिजाज को दबाया जाए, वो बनता है।

इसके बाद कौन कश्मीरी अपने हुकूक के लिए बाहर आएगा?

अगर हम ही लोग जो किसी पोस्ट पे बैठे हैं,

ये कहते हैं ना मरकज़ की तरफ़ से आप आओ यहां दबाओ क्योंकि यहां बनता है,

जो बाहर निकलने के लिए भी तैयार होगा, वो कहेगा ना अब तो इन्होंने तो खुली छूट दी है।

अब तो अगर कल को हमारे घर पे बुलडोज़र चलेगा, महबूबा जी कहेंगी ये तो बनता है।

अफ़सोस की बात है। बेहतर होता वो नहीं जातीं जंतर मंतर।

अगर जंतर मंतर जाके हमारा यही हाल करना था, तो बेहतर है घर में ही बैठतीं।

End of transcript · 518 words

iPhone app Translate videos on your iPhone Paste a TikTok, Instagram or X link, add subtitles in your language and save the video to Photos.

Read any video in your language

Paste a link from X, TikTok, YouTube or Instagram. You get a page like this one.

© 2026 TranslateMom Transcripts Sources Pricing Legal