पूजा धर्म है या धंधा? पंडितों की दक्षिणा पर बहस
सुनो बाल काटना नाई का धंधा है।
धंधा है।
और जूता सिलना मोची का धंधा है।
मोची का धंधा है।
और कपड़े धोना धोबी का धंधा है।
धोबी का धंधा है।
और पूजा करना पंडित का।
धंधा है,
धर्म धर्म है।
धंधा है।
धर्म, धर्म वो धर्म। पूजा करना धर्म का काम है।
तो पूजा करना धर्म कैसे हो गया जब सबका वो कर्म है, धंधा है
सबका।
संतोष पागल नहीं।
क्योंकि उनका कर्म ही पूजा है।
तो फिर उनका भी, नाई का भी, धोबी का भी, मोची का भी
पूजा हुई वो धर्म हुआ।
नहीं नहीं उनका धंधा है। ये सब चीज उनका business है, उनका पेशा है।
अच्छा! बाकियों का कर्म धंधा हो गया और तुम्हारा
कर्म
धर्म हो गया।
मेरा नहीं पंडितों का। मैं थोड़े पंडित हूं।
तो उससे भी तो पैसे कमाते हैं ना पंडित लोग। दक्षिणा नहीं मांगते।
भाई madam जी इतने रुपए देना।
इतना नहीं है वो खुशी से लोग देते हैं। उनका menu card
है। तुम कभी पूजा वूजा करवाना मुझे बताना। अच्छे पंडितों को जानता हूं मैं। उनका पूरा
menu card आता है कि इतने दिन का यग का इतना खर्चा आएगा, इतना इतना
सबका fix है rate fix है। जाओ ना वाराणसी वगैरह कभी गई नहीं क्या?
तो वो धंधा नहीं है। इनका तो बहुत महंगा धंधा है।
माता की। इनका धर्म होता है भाई। इनका कर्म ही धर्म है।
धर्म ही पूजा है, कर्म।
जिस चीज में तुम पैसे लोगे वो धंधा ही हुआ। चल निकल जा वो कोई भी हो।
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