Discussion on Hindu Identity in Film Industry
क्योंकि आज मैं सुबह एक पोस्ट कर रही थी एक हमारी फिल्म इंडस्ट्री की बहन है
बहुत ऐसी हमने फिल्म इंडस्ट्री में हिंदू बेटियां, बहनें
जिनके संपर्क में हम रहे हैं, उनको बहुत क्लोजली देखा भी है, जाना भी है
और हम देखते हैं कि
हैं वो हिंदू लेकिन चाहे पॉलिटिक्स हो, चाहे रिलीजन हो
उसको लेकर उनकी कोई विचारधारा नहीं है, यूथ में यूजुअली ऐसा होता है, वो बहुत ही न्यूट्रल हैं
लेकिन जैसे ही वो चाहे आप संबंध कह लीजिए, शादी कह लीजिए, दोस्ती कह लीजिए
इस्लामिस्ट के संपर्क में आते हैं, वैसे ही
उनकी सोच इतनी डिफाइंड हो जाती है, इतने कट्टरपंथी लेफ्टिस्ट वो बन जाते हैं
व्हिच आई थिंक देयर इज़ नो हार्म इन दैट
क्योंकि आपको संविधान ये आज़ादी देता है, आप जो चाहे
उस तरह का रिलीजन या आइडियोलॉजी अडॉप्ट कर सकते हैं, लेकिन
जो प्रॉब्लम की बात है, लेकिन जब हिंदू बेटियों की बात आती है
क्योंकि आज मैं अपने आप को डिफेंड नहीं करूंगी, मैं नहीं कहूंगी कि जी मैंने आइटम नंबर्स के खिलाफ
या पे पैरिटी के खिलाफ या कभी बड़ी-बड़ी फिल्मों में काम नहीं किया
हीरोस के खिलाफ मैंने जो है वो बहिष्कार किया
मैंने नेपोटिज्म के खिलाफ लड़ाई ली, आप मुझे ऐसा कैसे कह सकते हैं
हाँ, मैं एक मॉडरेट हिंदू थी
आज अगर मैंने खुद को डिफेंड कर लिया
तो इतनी न जाने कितनी बेटियां
जो ये जिसे कहते हैं कि लीप नहीं ले पाएंगी
हाँ, मैं मॉडरेट हिंदू थी
आज इसी वक्त मुझे जो है, जो मुझे तंज किया जाता है
तुम कब से संघी बन गई? मुझे संघी बनना है
मुझे जो है बीजेपी, आरएसएस की आइडियोलॉजी, जिसे एक अवेकंड हिंदू, मुझे बनना है, मुझे कनवर्ट होना है
मैं क्यों नहीं कनवर्ट हो सकती?
तो ये जो दोगलापन है समाज का, जब हिंदू बेटियों की बात आती है
तो जो समाज के ठेकेदार हैं, वो
एक अग्निपरीक्षा के लिए हमारे 10 साल पुराने
तुम तो पार्टी करती थी, तुम तो ये करती थी
ठीक है, मैं सब कुछ करती थी, लेकिन आज मुझे भी कनवर्ट होना है
और मुझे जो है एक डिफाइंड और एक अवेकंड हिंदू बनना है
तो मेरे लिए वो रास्ता क्यों बंद है?
तो ये जो है, ये एक दोगली सोच और दोगले विचार नहीं चलेंगे
और बाकी आप लोग मुझे बताइएगा मेरी और कैसे विचार फाइन हो सकते हैं
और आई जस्ट फील दैट हमारी बेटियों को भी
वो आज़ादी होनी चाहिए, अगर उनको कनवर्ट होना है
डिफाइंड और डिसिप्लिंड हिंदू में, व्हाई नॉट?
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