Discussion on Police Violence and Protests
थक गए होगे, नींद तो आ जाएगी ना आज रात को?
तकलीफ इस बात की नहीं रहेगी कि तुम लाठी नहीं मारते।
मारना ना मारना तुम्हारे हाथ में था ही नहीं, तुम तो अपना काम कर रहे थे, हम समझते हैं।
तकलीफ इस बात की ज़रूर रहेगी कि तुम थोड़ा धीरे से मारते।
इतने धीरे कि चोट नहीं लगती।
तुमने चुनाव किया है कि मुझे कितनी ज़ोर से वो लाठी घुमानी है।
और इस चुनाव के साथ तुमको आजीवन जीना पड़ेगा, याद रखना।
ये भ्रम अपने अंदर मत रखना कि मुझे सरकार ने मारने के लिए बोला था।
कितनी ज़ोर से मारना है, ये सरकार ने नहीं बोला था।
ये तुमने चुना था।
और ये चुनाव मरते दम तक तुम्हारे भीतर रहेगा।
तुम चाहते तो धीरे भी मार सकते थे, बच्चे ही तो थे ना।
और ये युद्ध का नियम होता है कि निहत्थों पर वार नहीं किया जाता।
दुनिया का पहला प्रोटेस्ट नहीं है।
बहुत से देशों में प्रोटेस्ट हुआ है जहाँ पुलिस ने चुना है ना मारना, रोकना।
ये तुम कर सकते थे आज।
लेकिन तकलीफ आज सबसे ज़्यादा तुमसे है।
तुमने जितनी बेरहमी से मारा है ना,
वो लाठियाँ सिर्फ़ वहाँ के बच्चों को नहीं पड़ी हैं,
जो वहाँ नहीं थे उनको भी पड़ी हैं।
और हम लोग भूलेंगे नहीं इस बात को।
किसी सरकार से कोई गुरेज़ नहीं है, तुम अपनी पार्टियाँ चलाते रहो, सब करते रहो।
मार्स पे जब आबादी आ जाए तो वहाँ भी अपनी पार्टी बना लेना, मतलब नहीं है।
हमें मतलब है
जब तुम वो लाठी घुमा रहे थे तो कितनी ज़ोर से घुमाना है, वो इंसानियत से।
और वो तुमने चुना है आज मारना।
खैर,
अच्छे से सोना, बढ़िया नींद लेना।
हल्दी वाला दूध पी लेना और
हम तुमको याद रखेंगे गुरु।
याद रखेंगे।
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