Dramatic Dialogue on National Pride

पर मैं अपने राष्ट्र की परवाह करता हूँ, इसलिए आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप आततायी व विध्वंसकारी अलक्षेंद्र का साथ न दें।

अलक्षेंद्र आततायी नहीं है, आचार्य। वह विश्व विजय के लिए निकला देवपुत्र है।

पाश्चात्य जगत ने तो धरती को सिर्फ एक ही देवपुत्र दिया है।

पर यह वह भूमि है जिसने करोड़ों देवपुत्रों को जन्म दिया है।

यह वह धरा है जहाँ मानव को भी ईश्वर बनने का अवसर दिया जाता है।

हम देवों के ही तो वंशज हैं।

अतः आततायियों की पाशविक क्रीड़ा से इस भूमि को कलंकित मत होने दो, आम्भी कुमार।

आप मेरा व देवपुत्र अलक्षेंद्र का अपमान कर रहे हैं, आचार्य।

अपने मान-अपमान के प्रति सजग आम्भी कुमार राष्ट्र का अपमान करने जा रहे हैं, क्या इसका आम्भी कुमार को ध्यान है?

तक्षशिला मेरी भूमि है, आचार्य। और इसके संबंध में निर्णय लेने के लिए मैं किसी के भी आदेशों से बाध्य नहीं हूँ।

तक्षशिला की पग-पग भूमि भारत की थाती है। उस पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं हो सकता, आम्भी कुमार।

आप मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे हैं, आचार्य।

जाओ, अपने षड्यंत्रों से स्वयं की रक्षा करो, आम्भी।

मेरी भूमि पर मुझे आदेश देने वाले आप कौन हैं?

ठहरो!

काल का आवाहन अभी बाकी है।

जाओ, आम्भी कुमार।

एक दिन तुम्हें गुरुकुल की सत्ता का परिचय मिल जाएगा।

मैं तुम्हें आदेश दे रहा हूँ, आम्भी कुमार। जाओ!

End of transcript · 229 words

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