डेटा प्रोटेक्शन कानून से खोजी पत्रकारिता को खतरा? सुप्रीम कोर्ट में याचिका
ना होगी पत्रकारिता,
ना खुलेगी
पोल। खोजी पत्रकारिता से
सरकार की चूल्हे ऐसी हिली
कि खोजी पत्रकारिता पर
बैन लगाने वाला कानून लेते आई
है। डिजिटल पर्सनल डेटा
प्रोटेक्शन एक्ट अगले साल मई से
लागू होगा। इसके खिलाफ डिजिटल
न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन ने
सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली है।
उन्होंने कोर्ट से कहा है कि यह
कानून पत्रकारिता पर सेंसरशिप
है। क्या है इस कानून में ऐसा जिसका
हर पत्रकार को विरोध करना चाहिए?
जान लीजिए इस कानून
के तहत जिस पर रिपोर्टर रिपोर्ट कर रहा
है, उस आदमी से ही सहमति
लेनी होगी जिसकी जांच
कर रहा है। उसी से
पूछना पड़ेगा कि भैया कर
ले हम तुम्हारी जांच।
इसका नतीजा क्या होगा?
इसका नतीजा यह होगा कि वो सबूत मिटा
देगा या फिर रिपोर्टर को। स्टोरी में
शामिल व्यक्ति अपने
निजी डेटा को हटाने की
मांग कर सकता है। अब ना रहेगा
डेटा ना रहेगी स्टोरी। सरकार खबर से जुड़ा डेटा
मांग सकती है। अब इससे क्या होगा
कि पत्रकारों के जो सोर्स हैं, जो
सूत्र हैं, उनकी पहचान
सामने आ जाएगी। अब डर के मारे
लोग
पत्रकारों को जानकारी देना बंद
कर देंगे। यानी सरकार ने पूरी कोशिश कर
दी है कि किसी भी तरीके से इन्वेस्टिगेटिव
जर्नलिज्म कोई ना कर पाए। हालांकि
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर
केंद्र सरकार से अब जवाब मांगा
है। देखते हैं सरकार
क्या कहती है। क्या
कहना है आपका? कमेंट करके बताइए और फॉलो करना ना भूलें।
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