मस्जिद बचाने के लिए महिला की अपील, समुदाय से आवाज उठाने का आह्वान
मैं कुछ नहीं कर सकती। मैं सिवा के आवाज उठा सकती हूं। अपने
सोए हुए ईमान को जगाओ। हमारे ईमान कैसे इतने कमजोर हो गए?
क्या हम अपनी मस्जिद नहीं बचा पाएँगे?
हम इतने कमजोर कैसे हो गए? मुझे क्यों निकलना पड़ रहा है?
यह मेरी जिम्मेदारी नहीं थी। मुझे एक औरत होकर निकलना पड़ रहा है।
कहां है मेरे कौम के भाई? कहां है मेरे कौम के मर्द?
कहां है वो लोग जिनको यह मस्जिद की आवाज़ उठाना चाहिए थी। पाँच
दिन से मैं आ रही हूँ। कोई नहीं था। तीन दिन तक कोई नहीं था। आज
आए लोग अल्लाह का शुक्र है। कल आए थे लोग अल्लाह का शुक्र है। प्लीज
आवाज़ उठाओ। मस्जिद ऐसे शहीद नहीं होने दो। हमारी इबादत का अल्लाह का घर
होता है यह। कब आप लोगों के ईमान आता होंगे?
कब आप लोग कहोगे हमें डरना नहीं।
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