तक्षशिला की सभा में शरणार्थियों पर बहस: परंपरा, संघर्ष और कर
बंद करो परंपरा और मानवता की बातें।
हम ही मानवता और परंपरा की बातें करते हैं और हम ही कुचले जाते
हैं।
दो राष्ट्रों के संबंधों के विकास की बातें करने वाले कुलमुख्य भूरीग्रवा की
बात मान ली जाए,
तो तक्षशिला के नागरिक यह निश्चित समझें
कि शीघ्र ही तक्षशिला भी खंड खंड में बटा हुआ जर्जर ही दिखाई देगा।
जिन विदेशियों को शरण देने की बात आप कह रहे हैं,
कल वे भी तक्षशिला की भूमि पर अपने अधिकार का दावा करेंगे।
जिस मानवतावाद की दुहाई दे आप उन्हें शरण देने की योजना बना रहे
हैं, उन्हीं मानवतावादियों की धरती कल धर्म जाति
के संघर्ष
से लाल हो उठेगी
और धरती का कोई मानवतावादी
उन संघर्षों के लिए उठी तलवारों को नहीं रोकेगा।
कल यही शरणार्थी आपके साथ पौरसभा में बैठेंगे और आपके निर्णयों
को प्रभावित करेंगे।
धर्म को जाति के नाम पर परंपराओं को कलंकित मत करो
रिपुदमन।
सत्य को स्वीकार करो भूरीग्रवा। जहां तक्षशिला के भविष्य का प्रश्न है,
वहां भावनाओं का कोई स्थान नहीं है।
हमारा धर्म अलग, हमारी भाषा अलग, हमारा व्यवहार अलग। कल
इन्हीं भेदों के नाम पर भेदभाव होगा और संघर्ष होगा।
हम अपनी परंपराओं को नहीं छोड़ना चाहते तो क्या वे अपनी परंपरा
छोड़ेंगे?
कल यही शरणार्थी आपके राज्य का अविभाज्य अंग होंगे
और यही आपके सामने बैठकर अपने तथाकथित अधिकारों की मांग करेंगे।
तब आपका मानवतावादी हृदय उन पर हथियार उठाने में संकोच महसूस
करेगा। क्या पौरसभा मुझे आश्वासन दे सकती
है
कि कल शरणार्थियों के कारण गांधार खंडित नहीं होगा?
क्या कोई पौर मुझे आश्वासन दे सकता है कि कल यही शरणार्थी अपनी
मातृभूमि लौट जाएंगे?
क्या पौरसभा स्वयं आश्वस्त है
कि शरणार्थियों के पुनर्वसन के नाम पर शासन तक्षशिला की प्रजा पर नवीन
करों का बोझ नहीं ला देगा?
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