Pollution Crisis in Meghalaya's Burnihat
जब आप असम और मेघालय का नाम सुनते हैं तो दिमाग में क्या आता है?
बादलों से ढके पहाड़, शीशे जैसी साफ़ नदियाँ,
पोल्यूशन से दूर एक जन्नत।
लेकिन इसी जन्नत के बीचों-बीच एक ऐसी जगह है
जहाँ बादलों की जगह ज़हरीले धुएं ने ले ली है।
स्विस एजेंसी IQAir और CREA के डेटा के मुताबिक
आज दुनिया का सबसे पोल्यूटेड शहर दिल्ली या लाहौर नहीं, बल्कि मेघालय का बर्नीहाट है।
हम लोग जब जवान था तब तक पूरा साफ़ था।
अभी जब कंपनी हुआ ना तब से इसे गंदा हो गया।
बीमार का गोदाम जैसा ही है बर्नीहाट।
करोड़ों की सरकारी सब्सिडी देकर यहाँ इथेनॉल बनाने के लिए इको-फ्रेंडली प्लांट लगाए गए।
लेकिन जब इस प्लांट के धुएं से बर्नीहाट का सरकारी AQI 400 पार कर गया,
तो NGT की जाँच में असम और मेघालय की सरकारों ने ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ दिया।
भारत में वैसे भी हाई पोल्यूशन वाली फैक्ट्रियां जानबूझकर के स्टेट के बॉर्डर्स पर लगाई जाती हैं,
क्योंकि इंडस्ट्रीज जानती हैं कि ज्यूरिसडिक्शनल लूपहोल का मतलब है ज़ीरो अकाउंटेबिलिटी।
जब तक दोनों राज्यों के पोल्यूशन बोर्ड लड़ते रहेंगे, ये फैक्ट्रियां मुनाफ़ा कमाती रहेंगी।
CSIR-NEERI की स्टडी के मुताबिक
बर्नीहाट की हवा में जितना धुआं सहने की क्षमता है,
ये फैक्ट्रियां उससे चार गुना, लगभग 25 टन रोज़ाना कचरा उगल रही हैं।
जिस इथेनॉल को बना करके हम दिल्ली, मुंबई की हवा साफ़ करने का दावा कर रहे हैं,
उसी प्लांट के केमिकल ने यहाँ की उमियम नदी को नाले में बदल दिया है।
सरकारी मेडिकल डेटा ही बताता है कि पिछले दो सालों में यहाँ सांस की बीमारियों में 76% का इज़ाफ़ा हुआ है,
और किसान अपनी ही उगाई हुई काली पड़ चुकी सब्जियां धोने को मजबूर हैं।
भाई, मुझे तो ये समझ नहीं आता कि जिस इथेनॉल से किसी शहर की हवा ख़राब हो रही है, पानी ज़हरीला हो रहा है, फल-सब्जियां दूषित हो रही हैं,
उस ग्रीन एनर्जी से असल में फ़ायदा किसका हो रहा है?
इस वीडियो को शेयर करो, शायद कोई सिस्टम का ठेकेदार आकर के कमेंट सेक्शन में इसका लॉजिक समझा सके।
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