Personal Reflection on Domestic Abuse
मेरी शादी का तीसरा दिन था और आज मेरी जिंदगी का पहला थप्पड़ था जो मैंने किसी
मर्द से खाया था और वो भी ऐसा मर्द जिसके लिए मैंने आठ साल stand लिया
था। घरवालों से लड़ी थी। उसकी बहन मेरा room set कर रही थी और मैं बाहर makeup कर रही
थी। उसने आकर जोरदार थप्पड़ मारा मेरे मुंह पर और बोला कि तुम यहां महारानी बन के नहीं
आई हो कि मेरी बहन से काम करवाओ। शादी हो चुकी है उसकी। वो मेहमान आई हुई है और तुम
उससे काम करवा रही हो। मां मेरी बूढ़ी है। बहन की शादी हो गई। घर पूरा तुम्हें
चलाना है। तुम खुद देख लो कैसे चलाना है और नौकरानियां हमारे घर में allow नहीं है। और
यह सुनकर मैं अपनी choices को सवाल कर रही थी कि मैंने क्या सोचा?
क्या choose किया? आठ साल मैं क्यों अंधी बनी हुई थी?
मैं अपने वालिदाइन से लड़ी, उसके लिए stand लिया,
उसकी बातों पर trust किया और आज
मुझे क्या मिला? थप्पड़। यह बताते हुए वो लड़की जोर-जोर से
रो रही थी
और मैं उसको दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा और वो कराह के बोल रही थी कि कुछ ठीक
नहीं होगा। मैंने खुद अपने साथ ज्यादती की। यह कुछ ठीक नहीं होगा।
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