RSS and the Indian National Flag History
1950 से लेकर 2002 तक RSS ने
अपने नेशनल हेडक्वार्टर पर फ्लैग होस्ट क्यों नहीं किया था? क्यों किया था? क्यों नहीं किया था?
तो मैं ये जानना चाहता हूँ सर कि इसका रीज़न क्या है?
किसने नहीं किया?
1950 से लेकर 2002 तक
RSS ने अपने नेशनल हेडक्वार्टर पर इंडियन फ्लैग क्यों नहीं होस्ट किया?
अच्छा।
तो हम लोग प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी को
जहाँ हैं वहाँ फ्लैग होस्टिंग करते हैं।
यहाँ पर एक कैंपस रेशीमबाग में है, एक महाल में है।
दोनों जगह फ्लैग होस्टिंग होता है।
ये हमको सवाल पूछना नहीं चाहिए लोगों ने,
क्योंकि एक घटना मैं बताता हूँ।
स्वतंत्र भारत का झंडा तिरंगे रंग का होगा।
और कांग्रेस का भी तिरंगे रंग का होगा।
उस समय एकमात्र बड़ी राजकीय संस्था कांग्रेस थी,
उसकी छत्रछाया में बाकी लोग थे।
तो ये तय हो गया 1933 में जलगाँव के पास फैजपुर है।
वहाँ पर अधिवेशन हुआ कांग्रेस का।
पहली बार
80 फुट ऊँचे पोल पर जवाहरलाल नेहरू जी के हाथ में
रस्सी देकर ध्वज फहराया गया, लेकिन वो बीच में लटक गया।
दस एक हज़ार लोग थे।
अब क्या करें? 40 फीट ऊँचा चढ़ना है।
बाँस पर चढ़ना है।
तो एक जवान दौड़ के आया, वो चढ़ा।
उसने वो गुत्थी सुलझाई,
ध्वज को ऊपर तक ले गया, नीचे आ गया।
लोगों ने जय-जयकार किया, उसको कंधे पर लिया।
जवाहरलाल जी ने उसकी पीठ थपथपाई।
कहा कि, "कल अधिवेशन में आओ, तुम्हारा हम सार्वजनिक अभिनंदन करेंगे।"
लेकिन वो हुआ नहीं, क्योंकि कुछ लोगों ने उनको जाके बताया कि ये संघ की शाखा में जाता है।
तो
वो नहीं हुआ।
यहाँ डॉक्टर हेडगेवार थे, उनको पता चला।
वो प्रवास करके
वहाँ गए।
और एक छोटा सा पीतल का ही लोटा
उसको बख्शीश दिया, उसकी पीठ थपथपाई।
उसका नाम था किसन सिंह राजपूत।
तो सात साल पहले उनका देहावसान हो गया।
मैं उनको दो बार मिला।
तो पहली बार ध्वज फहराए जाने में बाधा आई,
तब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
इस ध्वज के सम्मान के साथ जुड़ा है।
दो दिन ध्वज फहराने की बात है, वो भी हम कर रहे हैं।
परंतु वो फहराएँ न फहराएँ,
जहाँ-जहाँ इस ध्वज के सम्मान का प्रसंग आता है,
हमारा स्वयंसेवक अपने प्राण भी देने के लिए
अग्र पंक्ति में रहा है और रहते रहेगा।
ये पक्की बात है।
क्योंकि, क्योंकि वो भारत की सार्वभौम संप्रभु
प्रभुसत्ता का प्रतीक है।
पूर्व बंगाल में जब बांग्लादेश का युद्ध शुरू हुआ,
तो
रायगंज के आगे एक चौकी है।
वहाँ पर अचानक बांग्लादेश की आर्मी
आने लगी।
BSF के जवान थे वहाँ पर।
लेकिन उनको खबर नहीं थी।
हमारा वहाँ 12वीं में पढ़ने वाला चीका मुर्मू नाम का मुख्य शिक्षक
उसने देखा, उसने जाके अलर्ट किया।
तो जवानों ने कहा कि
आगे हमने
खंदक बनाया है, वहाँ की बारूद की पेटियाँ रखी हैं, वो लानी पड़ेंगी जल्दी।
तो
हम अभी डिफेन्स में हैं।
तो दो ही लोग मिल सकते हैं, एक तीसरा चाहिए।
तो ये जवानों के साथ वो पेटियाँ लाने के लिए गया।
और पेटियाँ लाते समय
वो शहीद हो गया।
वहाँ पर उसका छोटा सा स्मारक हम लोगों ने बनाया है।
और उस दिन वहाँ वार्षिक कार्यक्रम होता है।
तो हमारी संघ के स्वयंसेवकों की तो ये परंपरा है।
जहाँ पर देश के सम्मान का प्रश्न है,
राष्ट्रध्वज के सम्मान का प्रश्न है,
वहाँ पर हम सबसे आगे आपको मिलेंगे लड़ने के लिए, प्राण देने के लिए।
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