Discussion on Police Action and Democracy
कह रहे थे कि देवेंद्र फडणवीस soft hearted आदमी है। उन्होंने हम पर लाठीचार्ज
नहीं किया। उन्होंने हमें आंदोलन करने दिया। जबकि दिल्ली में हमने देखा कि उसको
लेकर काफी गुस्सा था कि लाठीचार्ज जिस तरीके से किया गया, जिस तरीके
से पुलिस brutality रही।
ऐसा है कि
अगर मेरी
आपके मालिक को गाली देने की इच्छा है
तो मैं कहूंगा साहिल अच्छा आदमी है, मालिक खराब है।
problem मालिक का है। साहिल बहुत बढ़िया आदमी है। साहिल जैसा आदमी नहीं है।
बहुत common है।
इससे साहिल ने खुश नहीं होना चाहिए। साहिल को समझना नहीं होना ही नहीं
चाहिए। साहिल को यह समझना अगर साहिल को यह समझा नहीं
कि भाई ये किसलिए बोल रहे हैं कि साहिल बहुत अच्छा आदमी है तो
फिर तो मतलब sorry to say पर इससे बड़ी मूर्खता तो कुछ हो नहीं सकती
ना साहिल। देखिए अगर वो सही मन से तारीफ करते ना
तो मैं खुशी खुशी तारीफ ले भी लेता और उनको thank you भी बोल
देता। पर उस तारीफ के पीछे का design मुझे मालूम है।
There is a trap.
इसलिए ऐसी तारीफ
ठीक है। लेकिन मैं आपको यह कहना चाहता हूं normally
महाराष्ट्र में
हमेशा हमारी policy रही है कि
जहां तक हो सके engage करिए
और जब तक कानून व्यवस्था का extreme प्रयास
मतलब को extreme हानि जब तक नहीं पहुंचती है तब
तक हम बल का प्रयोग नहीं करते।
लेकिन कभी कभी यह होता है। आप देखिए जैसे दिल्ली में हुआ
कि अगर यह लोग संसद चले जाते।
सवाल वो नहीं होता है। कुछ लोग संसद चले जाएंगे, तोड़फोड़ करेंगे।
इससे देश की बदनामी होती है,
इससे पुलिस force की बदनामी होती है और दुनिया में यह संदेश जाता है
कि यह देखिए कितनी weak democracy है, कितनी weak country है कि
जिसके संसद में लोग घुस जाते और संसद के अंदर
एक प्रकार से तोड़फोड़ हो जाती है। यह देश के लिए अच्छा नहीं होता है। देश की
ultimately एक जो हमारा deterrent होता है, दुनिया में एक
मजबूत देश यह उसके लिए उसकी हानि होती है।
तो इसीलिए कभी कभी ऐसा भी करना पड़ता है कि
जब कोई मानने को तैयार नहीं होता। लोग कानून हाथ में ले लेते हैं।
जो संवैधानिक व्यवस्था है, उस उन व्यवस्था को तोड़ देते हैं तो
बल का प्रयोग तो करना पड़ता है। पर
बल का प्रयोग अंतिम होना चाहिए और महाराष्ट्र में हम लोग
बहुत संयम के साथ प्रयास करते हैं कि बल का प्रयोग कम से कम
करना पड़े।
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