Ravana's Redemption and Divine Justice
भगवान शिव ने कभी भी अपने प्रिय भक्त रावण को उसकी गलतियों की
माफी नहीं दी। चाहे वह राम जी के हाथों मरने के बाद
भी उसकी आत्मा को मोक्ष नहीं दिया। क्यों?
यह scene उस चीज को बहुत beautifully explain करता है।
देखो और फिर तुम्हें समझ आएगा क्यों।
रावण जो शिवजी के परम प्रिय भक्त थे।
मरने के पश्चात सालों तक तपस्या करते रहे कि शिवजी
उनको दर्शन दे
और उनको क्षमा करें। मगर शिवजी ने ऐसा नहीं किया।
यह सब देखकर पार्वती जी से रहा नहीं गया और वह दौड़ती हुई
शिवजी के पास गई और बोली, "हे प्रभु!
आप इतने कठोर कैसे हो सकते हैं?
रावण जैसे अपने परम प्रिय भक्त को दर्शन क्यों नहीं दे रहे?
उसको क्षमा क्यों नहीं कर रहे?"
शिवजी
मन मन मुस्काए
और कहा, "हे पार्वती!
इस संसार में कुकर्म को तीन भागों में बांटा गया है।
पहला पाप
जो आदमी कभी जाने कभी अनजाने में करता है, उसका
निवारण प्रायश्चित करके, माफी मांग के और किसी और तरीके से
भरपाई करके हो सकता है। दूसरा कुकर्म अति पाप के
रूप में जाना जाता है। जैसे हत्या, अपहरण और जघन्य
अपराध। उनकी भी कुछ हद तक माफी संभव है।
मगर तीसरा कुकर्म
महापाप के रूप में जाना जाता है, जिसकी कोई
माफी नहीं है।" इस पर पार्वती जी ने शिवजी को टोका और
अचंभे से पूछा, "हे प्रभु!
रावण ने तो सीता जी का अपहरण किया था। वह तो अति पाप के
रूप में जाना जाना चाहिए। आप उसे महापाप क्यों मान
रहे हैं?" तो शिवजी मन मन
मुस्काए
और कहा, "हे पार्वती!
जिस पाप का प्रभाव पूरे संसार की मानवता और
प्रभुता पर सदियों तक रहता है।
वह महापाप के अंतर्गत आता है। मैं रावण को माफ
कर देता,
अगर उसने रावण बनकर सीता का अपहरण किया होता।
लेकिन उसने साधु का भेष धारण किया था जिसका
प्रभाव पूरे संसार के साधुत्व और सनातन पर
सदियों तक रहेगा। जिसकी कोई माफी नहीं है Your Honor और
यह रावण है रावण। इसे कतई नहीं
छोड़ा जाना चाहिए। इसने गुरु भक्ति के साथ विश्वासघात किया है।
मासूम बच्चों के साथ विश्वासघात किया है। इसने मेरे और
हम सबके महादेव के साथ विश्वासघात किया है।
उनका नाम इस्तेमाल कर एक जघन्य अपराध किया है। I
claim a death penalty.
To be hanged till death."
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