Supreme Court Judges Discuss Voting Rights
ज्ञानेश कुमार और Supreme Court पर इससे ज्यादा
कड़ी टिप्पणी नहीं हो सकती थी। वह भी एक sitting
judge Supreme Court के एक वर्तमान judge द्वारा जो दो हज़ार
उनतीस में retire हो रहे हैं। ऐसा नहीं कि वह retired हो चुके हैं।
सबसे बड़ी बात एक और retired Supreme Court
judge ने कहा है कि इस देश में अब voting का जो अधिकार
है वह खतरे में आ गया है। यह दोनों टिप्पणियां Supreme Court
खासतौर से ज्ञानेश कुमार को कटघरे में रख रही हैं।
सबसे पहले दोस्तों आपकी screens पर Justice उज्जवल
भुइयां जो कि sitting judge हैं retired नहीं हैं और
retirement में अभी उन्हें कम से कम तीन साल हैं। गौर फरमाइए उनका बयान।
Any process taking away voting rights of millions of citizens
is unjustifiable. No court can condone it.
आसान अल्फाज में Supreme Court के Justice उज्जवल भुइयां ने कहा
कि भारतीय नागरिक का vote का अधिकार संविधान के मूल ढांचे का
अहम हिस्सा है। अगर किसी प्रक्रिया से बड़ी संख्या में
नागरिकों का vote देने का अधिकार छिनता है तो वह अपने आप
में मनमानी होगी और संविधान के अनुच्छेद चौदा और
अनुच्छेद तीन सौ छब्बीस का उल्लंघन करेगी। Justice भुइयां ने कहा कि vote
देने का अधिकार सिर्फ कानून से मिला अधिकार नहीं है बल्कि संविधान से
मिला अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद तीन सौ छब्बीस guarantee देता
है कि लोकसभा और राज्यसभा विधानसभाओं के चुनाव
वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।
तेरह करोड़। इस संख्या पर गौर कीजिए दोस्तों SIR के जरिए इस देश
से तेरह करोड़ मतदाताओं को हटा दिया गया। याद कीजिएगा
उस business अखबार की report जिसने कहा था कि हम दस साल पीछे पहुंच गए
हैं। यानी कि साल दो हज़ार पंद्रह में जितने voters थे
अब उतने voters हो गए हैं। दोबारा voters की संख्या बढ़नी चाहिए
मगर चुनाव आयोग उसे घटा रहा है।
आपकी screens पर यह Justice रोहिंटन नरीमन।
यह Supreme Court के judge हैं
और इन्होंने कहा है अपने तल्ख बयान में कि हमारा जो
voting का अधिकार वह खतरे में आ गया है। गौर
फरमाइए Justice रोहिंटन नरीमन क्या कहते हैं आपकी screens पर।
सबसे पहले
vote देने का अधिकार। हमारे संविधान और लोकतंत्र का दिल यानी vote
देने का अधिकार बड़े खतरे में है। चुनाव आयोग पर उन्होंने क्या कहा?
ऐसा चुनाव आयोग नहीं हो सकता जो इस तरह काम करे या ठीक से काम ही
ना करे। एक commissioner के फैसले पर उन्होंने उन खबरों का जिक्र
किया जिनमें कहा गया कि बाकी दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के
बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ने अहम फैसले किए। चुनाव
आयुक्तों की नियुक्ति उन्होंने दो हज़ार तेईस के उस कानून की आलोचना की
जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार के पास
है। उन्होंने Supreme Court से उस कानून को चुनौती देने वाली याचिका
पर जल्द फैसला करने की appeal की।
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