Social Commentary on Poverty and Patriotism
हम एक ऐसे समाज में जीते हैं जहां पत्थर के मूर्त को लगते हैं
छप्पन भोग। भूखे-नंगे तड़पते सो जाते हैं लोग।
भूखे-नंगे तड़पते सो जाते हैं लोग। मजदूर को मजदूर
समझिए, मजबूर नहीं। गरीब को काम दीजिए, दान नहीं। और अगर दान
देने के इच्छुक हैं तो जीते जी रक्त दान दीजिए और मरने के बाद
अंगदान देकर मरते हुए लोगों को जीवन दान दीजिए। यही है सच्ची
देशभक्ति। यही है सच्ची राष्ट्र प्रेम। ना सरकार मेरी है,
ना रब मेरा है, ना सरकार मेरी है, ना रब मेरा है। और ये ना ही
बड़ा सरनाम मेरा है। बस इतनी सी बात का गुरूर है मुझे कि मैं
भारत की हूं और यह भारत मेरा है और यह भारत मेरा है।
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