Philosophical Insights on Action and Awareness
कर्म बिना तो शरीर की यात्रा संभव ही नहीं।
व्यक्ति सांस तो लेगा ही ना पार्थ।
यदि वातावरण में कोई सुगंध या दुर्गंध है तो वह उसका अनुभव करने
के लिए भी विवश है।
यदि उसके आसपास कोई नाद है, कोई ध्वनि है, कोई कोलाहल है
तो उसे सुनने के लिए उसके कर्ण उसके आदेश की प्रतीक्षा तो नहीं करेंगे
ना।
इसलिए जो अपने इंद्रियों को नियंत्रित रखे,
जो उन पर अपनी चेतना का अंकुश लगाकर उन्हें कर्मोन्मुख करे, उन्हें
कर्म की दिशा दिखाए वही श्रेष्ठ है।
वह अपने विकल्पों को समझता है पार्थ और अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग
करता है। और हे पार्थ! अपने नियत कर्म करना
कुछ न करने से अच्छा है।
अब यह भी ठीक है पार्थ कि आंखें देखती हैं किंतु वे क्या देखें
और क्या न देखें, इसका निर्णय तो ज्ञानी स्वयं ही लेता है।
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