Social Justice and National Identity Speech
तुम कहते हो ये अंशन वंशन से क्या होगा?
ये तो नाटक है, बात का बतंगड बनाने से क्या होगा?
पर ये अंशन जो तुम देख रहे हो, ये एक इनसान की लड़ाई नहीं है।
लाखों मजबूर जो दम घोट के जीते हैं, उनकी याद तुम्हें आज तक आई ही नहीं है।
पानी की मार, सच की हार, तुम्हारे पास करुणों के नोट, इनके पास सोने को चटाई नहीं है।
पढ़ाई का रस्ता था इनके पास, अब उसकी भी चावी नहीं है।
प्रशन पूछने का अधिकार नहीं है, पेड़ काटने चले हो, किसी की भावनाव का सम्मान नहीं है।
भूलो मत, ये देश वासी है तुम्हारे, इनके बिना तुम्हारा वजूद नहीं है।
बढ़ाई करते हो तुम अपनी, हर अकबार, हर समाचार में।
लोकतंत्र के चार स्टंब में तुम्हारा राज है।
याद रखना, भगवान कृष्ण ने भी कहा था, घवंड में जीना सबसे बड़ा पाप है।
कहते हो तुम खुद को विश्व गुरू, पर अब विश्व भी मुण कर कह रहा है।
कर्तव करो अपना, तुमारे देश का नागरेंग जल रहा है।
बरलोहा है हम, जल के निखराएंगे।
किसी के बाप का नहीं है हिंदुस्तान, हम हिंद हैं, समभल जाएंगे।
जनोन हैं, वजूद है, हम साथ हैं, निखर जाएंगे।
समभल लीजे अपनी रद्दी, अगर छा गए, तो कहर ढाएंगे।
जय हिंद!
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