Political Commentary on Protest Behavior
जंतर-मंतर कोई जगह है गाली देने की?
देना हो तो पार्लियामेंट में दो।
...के टट्टे।
बच्चों, कितनी गलत बात है। यह प्रोटेस्ट रैली है, कोई इलेक्शन रैली थोड़ी कि
आपने माइक लगाके गाली दे दी और सब सुन लेंगे, किसी को कोई प्रॉब्लम नहीं होगी।
अरे ओ मादर...
और उससे बड़ी बात यह कि पॉलिटिकल ओपिनियन देकर लड़कियों ने गाली दी, जबकि उनका काम तो
पॉलिटिकल ओपिनियन देकर गाली खाने का था।
ऐसे थोड़ी कि आप जाके गाली दे रहे हो, उसका भी प्रोटोकॉल होता है।
पहले आप धर्म के रखवाले बनो, कोई रक्षा दल ज्वाइन करो,
अपनी इंस्टाग्राम बायो में कुछ धर्म की लाइनें लिखो,
फिर तो आप गाली या रेप थ्रेट भी दे सकते हो,
वरना तो संस्कृति खतरे में आ जाएगी।
और एक हफ्ते से सरकारी लोग बच्चों को इस बात पे टारगेट कर रहे हैं कि वहां हमारे देश के
प्रधान सेवक को गाली कैसे दे दी गई।
डेली 1 किलो, 2 किलो गालियां खाता हूं,
उसमें से 700-800 ग्राम तो जंतर-मंतर की थी, देखो।
एंड दोस्तों, गलत है। सवाल पूछने का अधिकार है, गाली नहीं देनी चाहिए।
यह बिल्कुल गलत है। सुप्रिया जी की कसम,
मैं खंडन करती हूं।
हिंदू हो या मुल्ला हो?
...अगर आज के बाद दिख गए ना कोई सा भी,
हाथ हटा, हाथ हटा... मादर... बहुत मारूंगा भोस... भाग बहन...
बिल्कुल खंडन करता हूं मैं इस बात का। कितना गलत हुआ। मेरे को सबसे अच्छा लगता है कि
हर सिचुएशन पे हमारे मोदी जी इतने अच्छे लीडर हैं, मेरा वोट तो उन्हीं को जाता है बाय द वे,
कि उनका हर एक सिचुएशन के लिए एक मीम होता है।
इसके लिए पता क्या है?
हिपोक्रेसी की भी सीमा होती है।
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