Dialogue from a Mythological Play
ये किस अभिप्राय से आए होंगे?
तनिक सावधानी से बात करना भैया।
मुझे तो ये असली नहीं दिखाई देते।
वन में आने के बाद तुम बहुत शंकालु स्वभाव के हो गए हो लक्ष्मण।
अनुभव ही कुछ ऐसे हो रहे हैं भैया।
देखिए, वो पंडित महाशय हमारी ओर ही चले आ रहे हैं।
प्रणाम विप्र श्रेष्ठ।
प्रणाम पंडित महाशय।
कल्याणमस्तु, कल्याणमस्तु।
आप कुछ पथभ्रांत पथिक जान पड़ रहे हैं?
हे ब्राह्मण देवता, आपका अनुमान सत्य है।
हम ऋष्यमूक पर्वत पर जाने का मार्ग ढूंढ रहे हैं।
हूँ, मम् अनुमानम् सत्यम् अस्ति, मम् अनुमानम् सत्यम् अस्ति।
क्या आप हमें बताने की कृपा करेंगे कि ऋष्यमूक पर्वत के शिखर पर जाने का मार्ग कौन सा है?
हूँ, किम् प्रयोजनम्? किम् प्रयोजनम्?
इमां नदीं शुभजलां शोभयन्तौ तरस्विनौ। प्रम्पां पर्वतश्रेष्ठं सबभूयोरन्भाषित॥
श्रीमन्तौ रूपसम्पन्नौ वृषभश्रेष्ठविक्रमौ।
एवम् मा परिभाषतम् कस्माद् वै नाभिभाषत?
हे विप्र श्रेष्ठ, चतुराई के साथ शिष्टाचार युक्त
अपने सुमधुर संस्कृत सम्भाषण द्वारा आप जिस प्रकार हमारे विषय में जानने को जिज्ञासु हो उठे हैं,
उससे हम भी विचार में पड़ गए हैं। क्या आप वास्तव में वही हैं जो दिखाई दे रहे हैं?
अर्थात?
अर्थात ये कि हमारे छोटे से प्रश्न का उत्तर न देकर
केवल हमारा भेद जानना चाहते हैं?
महानुभाव, आप अपने रास्ते चले जाइए।
जब हम यहाँ तक पहुँच ही गए हैं, तो ऋष्यमूक पर्वत के शिखर तक भी पहुँच ही जाएँगे।
रोषम् करोति दोषम् तरुण तपस्वी।
रोष त्याग कर केवल इतना बता दें, ऋष्यमूक पर्वत पर किसके पास जाना है?
वर्षों व्यतीत हो गए इस पथ पर किसी का आगमन नहीं हुआ।
आप क्यों लालायित हैं वहाँ जाने को?
हमारे प्रश्न के उत्तर में एक और प्रश्न?
भैया, इनके चक्कर में मत पड़िए। हम अपना मार्ग स्वयं ढूँढ लेंगे।
तुम्हारा कथन सर्वथा निरर्थक नहीं।
परन्तु हम इनकी पाण्डित्यपूर्ण वाणी से मन्त्रमुग्ध हो गए हैं।
ये अथर्ववेद, यजुर्वेद, सामवेद के ज्ञाता परम विद्वान जान पड़ते हैं।
ऐसे व्याकरणविद्, वेदवेत्ता महात्मा के मन में
किसी प्रकार के छल-कपट की भावना की सम्भावना नहीं हो सकती।
इनसे मेल करना हमारे हित में होगा।
अच्छी बात है, आप कर लीजिए इनसे मेल।
बात यह है ब्राह्मण देवता, हमें निर्देश प्राप्त हुआ है
कि महाबली सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर वास करते हैं। हमें उनसे मिलना चाहिए।
महाराज सुग्रीव से? वो किसी से नहीं मिलते।
आपको कैसे पता? आप उन्हें जानते हैं?
अवश्य जानते हैं, अवश्य जानते हैं।
सुग्रीवो नाम धर्मात्मा कश्चिद् वानरपुङ्गवः।
और हम हैं उनके कुल पुरोहित, पण्डित केसरी नन्दन।
कुल पुरोहित?
हाँ, कुल पुरोहित। हमारी मन्त्रणा के बिना वो किसी से नहीं मिलते।
सो ये बताइए कि ऋष्यमूक पर्वत का पता किसने दिया है आपको?
माता शबरी ने।
माँ तपस्विनी शबरी?
किम् कारणम्? किम् अभिप्रायम्?
भैया, ये पण्डित महाशय तो केवल प्रश्न करना ही जानते हैं।
मेरा अनुमान है कि इन पण्डित महाशय का नाम ही प्रश्ननन्द महाराज है।
प्रश्न का उत्तर देना तो इनके गुरु ने इन्हें सिखाया ही नहीं।
और आप केवल रोष करने में ही प्रवीण हैं।
और आप शान्ताकारम् धीर गम्भीर हैं। वीर मनुष्यों, देव रूपिणों,
कृपा करके अपना मन्तव्य प्रकट कीजिए।
बात यह है विप्रवर, माता शबरी ने हमारा मार्गदर्शन किया है।
उन्होंने बताया है कि इस समय महाराज सुग्रीव से मिलना हमारे लिए कल्याणकारी होगा।
यदि आपके कथनानुसार सुग्रीव जी नहीं मिल सकते,
तो हमें उनके मन्त्री श्री हनुमान जी से ही मिलवा दीजिए। आपकी असीम अनुकम्पा होगी।
आप हनुमान से मिलेंगे?
अवश्य। उनके दर्शन हो जाएँगे, तो सुग्रीव जी से मिलने का साधन भी सुगम हो जाएगा।
यदि आप अपना वास्तविक परिचय दे दें, तो हनुमान को हम अभी बुला देंगे, इसी क्षण।
लो, इसी क्षण बुला देंगे। जैसे हनुमान इनकी पोथी में बन्द हैं।
अवश्य। आप अपना परिचय तो दीजिए, हनुमान मेरे चुटकी बजाते ही आ जाएँगे।
अच्छी बात है, तो सुनो।
हम अयोध्या के परम प्रतापी महाराजा दशरथ के पुत्र हैं।
हम वानरराज सुग्रीव से मित्रता करना चाहते हैं।
मेरा नाम लक्ष्मण है, ये मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्री रामचन्द्र जी हैं।
राम? श्री रामचन्द्र?
आप स्वयं?
हाँ भाई, स्वयं श्री राम यहीं हैं। अब बजाओ चुटकी, बुलाओ हनुमान को।
श्री राम!
ये क्या कर रहे हैं आप?
यह उचित नहीं।
एक तो हम आपके द्वार पर कुछ माँगने आए हैं,
दूसरे आप ब्राह्मण के रूप में हैं, महाराज सुग्रीव के कुल पुरोहित।
तीनों प्रकार से आप तो पूजनीय हैं विप्रवर।
फिर आप मेरे चरण क्यों छू रहे हैं? मुझे पाप लगेगा।
स्वामी के चरण छूना पाप नहीं होता प्रभु।
परन्तु मैं आपका स्वामी नहीं हूँ।
आपके स्वामी तो महाराज सुग्रीव हैं।
स्वामी का मित्र भी स्वामी ही होता है प्रभु।
इसलिए आप मेरे स्वामी हैं, वन्दनीय हैं।
आपने सेवक को उठाकर अपने गले से लगा लिया,
यह आपकी महानता है।
ऐसे दयालु स्वामी के लिए तो सेवक को प्राण भी न्योछावर कर देने चाहिए।
इतनी मीठी-मीठी बातें कर रहे हैं पण्डित महाशय,
परन्तु अभी तक अपनी पहचान नहीं होने दी।
यही कुशल गुप्तचर की निशानी है।
लक्ष्मण भैया, अब गुप्त क्या रह गया है?
सारे भ्रम दूर हो गए।
केवल मन में इतना सा खेद रह गया है,
मैं तो जड़मति वानर ठहरा, प्रभु को पहचानने में देर हो गई।
किन्तु श्री राम तो सर्वज्ञ हैं,
इन्होंने अपने अनादि भक्त हनुमान को पहचानने में इतनी देर क्यों कर दी?
हनुमान? तुम हनुमान हो?
हां भैया, मैं ही चिरसेवक वही हनुमान हूँ।
End of transcript · 859 words