Critique of Media Coverage on Protests
शर्म नहीं आती इनको ऐसे
अखबार छापते हुए? ये है आज का Times of India.
अब हेडलाइन देखो इनकी।
कि कॉप्स ने ब्लॉक कर दिया प्रोटेस्टर्स को।
जैसे गोलकीपर गोल को ब्लॉक करता है ना? और नड्डा जी मिल रहे हैं।
बाकी अखबार कम से कम इस बात को तो मानते हैं कि भाई
पिछले 14 साल का सबसे बड़ा प्रोटेस्ट था। बाकी जो भी खबरें दी हों, ना दी हों।
फ्रंट पेज पे बोलते तो हैं कि लाठीचार्ज हुआ है,
कैनन हुए हैं इस्तेमाल टियर गैस के।
कुछ का ज़िक्र नहीं है।
सबहेडिंग देखिए।
कहते हैं,
"118 cops and 60 marchers injured."
आपको पता नहीं लगा? दिल्ली पुलिस की इतनी पिटाई हुई कल?
दूसरा अखबार 'The Hindu'
एग्जैक्ट फिगर देता है, 103 तो कम से कम दो अस्पताल से रिपोर्ट है
कि प्रोटेस्टर्स वहां पे भर्ती हुए हैं।
और ये कहते हैं, 60।
फोटो देखिए।
फोटो लगाते हैं एक प्रोटेस्टर पत्थर मार रहा है।
फ्रंट पेज पे फोटो है।
इंटरनेट भरा हुआ है फोटोज से, पुलिस के पत्थर मारने के फोटोज से।
पुलिस गाड़ी लाके रखती है पत्थरों से भरी हुई।
ये जनाब ये फोटो छापते हैं।
लाठी चलने की, ब्रूटैलिटी की कोई खबर नहीं।
भाषा इनकी देखिए, मतलब सदके जाएं इस भाषा पे।
कहते हैं,
प्रोटेस्ट...
"Thousands of protesters ran into police barricades, lathis and tear gas."
मतलब,
पुलिसवाले बेचारे लाठी चलाने की प्रैक्टिस कर रहे थे और ये प्रोटेस्टर आके बीच में लाठियों में भिड़ गए।
वो टियर गैस के ऐसे खेल रहे थे और ये लोग आके इसके अंदर लग गए।
इस तरह की खबरें इजराइल की प्रेस फिलिस्तीन के बारे में छापती है।
कैसे ये लोग दिखाते होंगे अगले दिन सुबह अपने बच्चों को ये अखबार?
"Lies of India" नाम होना चाहिए अखबार का।
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