Critique of AI Trends and Environmental Impact
भाई ये इंटरनेट पर क्या नई खुजली मच रही है कि मैं 1980s में होता तो कैसे दिखता?
मतलब कुछ भी। वैसे ही हमारी government हमें चालीस साल पीछे खींच रही है और तुम photo
बनाकर खुद ही 1980s में जा रहे हो। ये जो retro photos का trend चल रहा है, उसमें भाई
लोग पागल की तरह अपनी photo ChatGPT को दे रहे हैं और वो Instagram पर reshare कर रहे
हैं। But nobody knows कि भाई इसके पीछे का असली game क्या है। दुनिया भर में लोग AI
use कर रहे हैं research के लिए, complex coding के लिए,
even cancer detection
machine बनाने के लिए और हमारे यहां पर क्या चल रहा है?
हम देख रहे हैं 1980s में हम hero कैसे लगते हैं। ये कोई आम trend नहीं है। ये
OpenAI जैसी बड़ी tech companies की strategy होती है। Consumer को free
dopamine
दो। उनको AI server पर लाओ। उनका face data extract करो और free में
platform का daily active user pump कराओ। और इस सबसे बड़े तमाशे की असली कीमत
पता है। University of UN की report बताती है कि एक AI की image generate करने के
लिए backend में liters में मीठा पानी evaporate होता है ताकि उनके servers ठंडे
रहे। एक तरफ देश में पीने के पानी की किल्लत है और दूसरी तरफ हम trillions of
litre पानी फूंक रहे हैं। सिर्फ ये दिखाने के लिए कि हम bell bottom pant में कैसे
लगते हैं। Such a bullshit. Tech companies भाई तुम्हारी validation के
चक्कर में
billions कमा रही है और तुम लोग environment का कचरा कर रहे हो। ये video उन सबको
share करो जो सुबह से ऐसी photos को story पर लगा रहे हैं। थोड़ा सा दिमाग use करो
भाई। Sheep बनना बंद करो जरा।
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