Addressing Youth Behavior and Society
Hi friends, आज तो मन करता है बस आपसे ही बातें करूं.
जंतर मंतर पर जो कुछ भी हुआ, देश और दुनिया ने देखा है.
कुछ शरारती बच्चों ने भद्दी-भद्दी गालियां बोलीं.
किसी भी सभ्य समाज को शोभा न दें, ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया.
मुझे तो गालियां दी गईं, मेरी स्वर्गीय माता को भी गालियां दी गईं.
न जाने कितना भद्दा स्वरूप था.
लेकिन मैं आज बात करना चाहता हूं
कि बचपन में गलतियां होती हैं.
और बचपन में गलतियों से सुधरने का अवसर भी होता है
और यही तो बचपना है.
और इसलिए मैं समाज के अंदर
जो आक्रोश है, उसको भली-भांति समझ सकता हूं.
एक कल्चरल शॉक है कि हमारी बेटियां
इस प्रकार की भाषा कैसे बोल सकती हैं.
लेकिन समय है इन बच्चों को गले लगा करके राह दिखाने का.
ये गुमराह बच्चे हैं, उनको राह दिखाना हमारा काम है.
उनको सजा देना, अदालतों के चक्कर कटवाना,
समाज में उनको प्रताड़ित करना, इससे हम परिस्थितियां नहीं बदल पाएंगे.
मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं.
समाज भी मेरी इस बात को स्वीकार करे
क्योंकि मेरे मन में एक ही भाव है.
कभी-कभी दांतों तले हमारी जीभ आ जाती है,
खून निकल आता है.
लेकिन हम दांत तोड़ते नहीं हैं क्योंकि दांत भी हमारे हैं, जीभ भी हमारी है.
बच्चे भी हमारे हैं, उन्हें राह दिखाना हमारा काम है.
गुमराह को राह दिखाना कठिन होता है, लेकिन कठिन काम हमको करना है.
और इसलिए आओ, मैं इन बच्चों को कहता हूं कि बच्चों आओ, हम देश के लिए साथ मिलकर के आगे बढ़ें.
कुछ नया सीखें, गलतियों से भी सीखें, अपने सपनों को लेकर के चल पड़ें.
देश बहुत आगे बढ़ रहा है, आगे बढ़ने वाला है
और आपका भी आगे बढ़ना निश्चित हो, यही मेरा सपना है.
मैं आपके लिए जीता हूं, आपके उज्जवल भविष्य के लिए खपता हूं.
आओ, हम मिलकर के देश को आगे बढ़ाएं.
बहुत-बहुत धन्यवाद दोस्तों, बस आओ, गलतियों से सीखो, आगे बढ़ो.
End of transcript · 325 words