Investigation of B.Ed Colleges in Madhya Pradesh
मैं जहां खड़ा हूं वो आधिकारिक तौर पर एक बीएड कॉलेज है।
यहां छात्र भी हैं, कैंपस भी है,
खेलकूद के लिए मैदान तो है ही, पुस्तकालय भी है,
लैब भी है और साल दर साल यहां से 150 बच्चे,
100 बीएड के और 50 बीएससी बीएड के पास होकर निकले हैं।
एनडीटीवी की टीम खसरा नंबर 148, 149, 2/1 पर पहुंची तो जमीन ने कागजों की कहानी पलट दी।
मौके पर तीन भवन मिले। एक भवन पूरी तरह बंद, दूसरे पर मिलेनियम ग्रुप का बोर्ड, तीसरा निर्माणाधीन।
बाहर बगलामुखी कॉलेज का बोर्ड लगा था, लेकिन श्रीराम कॉलेज नाम की कोई संस्था जमीन पर नहीं मिली।
स्थानीय लोगों ने भी कहा कि इस परिसर में ऐसा कोई कॉलेज नहीं है।
यानी जमीन पर कॉलेज नहीं, लेकिन कागजों में हर साल 150 प्रशिक्षित शिक्षक निकलते हैं।
प्रवेश हुआ, परीक्षाएं हुईं, नतीजे आए और डिग्रियां भी बांटी गईं।
ये इस जांच की पहली तस्वीर है, लेकिन ये कहानी सिर्फ मुगलिया कोट तक सीमित नहीं।
भोपाल के बावड़िया कला में सेवियर कॉलेज पहुंचने पर तस्वीर अलग थी,
लेकिन सवाल उतने ही गंभीर।
कॉलेज एक स्कूल परिसर में चलता मिला।
इसी कैंपस में मोहल्ले की सोसाइटी का दफ्तर भी था।
कॉलेज प्रबंधन ने कहा कि विश्वविद्यालय ने जो कमियां बताई थीं उन्हें पूरा कर लिया गया है।
उनका ये भी दावा है कि जब कॉलेज खुला था तो कई नियम मौजूद नहीं थे, ऐसे में नए नियम उन पर लागू नहीं होते।
हां, जो सुधार का था, थोड़ा हमारी लाइब्रेरी में प्रॉब्लम बताई थी, कुछ बुक्स कम थे,
तो वो सब हमने मंगवा लिए हैं और कुछ जर्नल्स मंगवाना था, वो भी मंगवा लिए हैं।
बस हमारी वही कमी थी मेन।
अच्छा, स्टूडेंट्स वगैरह रेगुलर आते हैं?
हां, स्टूडेंट रेगुलर आते हैं, पर जो 100% आना चाहिए, वो नहीं आते।
वो नहीं आते।
कितनी फैकल्टी और कितने स्टूडेंट्स और कितने बैचेस अभी तक निकल चुके हैं?
मेरे यहां से, मतलब मैं जब से यहां आई हूं, मेरे 10 साल हो रहे हैं करीब मेरे को,
तो मतलब मान के चलिए कि करीब
20 निकल चुके हैं सेशन।
ये बयान अपने आप में बड़ा है।
अगर शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों में छात्र नियमित रूप से नहीं आते, तो शिक्षक कैसे तैयार हो रहे हैं?
बीएड सिर्फ एक डिग्री नहीं, ये भविष्य के स्कूल शिक्षकों को तैयार करने की प्रक्रिया है।
इसमें क्लास, प्रैक्टिकल, प्रैक्टिस टीचिंग, लाइब्रेरी, लैब और फैकल्टी सब जरूरी है।
भोपाल के साकेत नगर में कमलनाथ बीएड कॉलेज का पता एनसीटीई के दस्तावेजों में दर्ज है।
हम जब वहां पहुंचे तो एक कमरे में एक शिक्षिका मिलीं।
उन्होंने बताया कि कॉलेज कहीं और से संचालित होता है और इसकी सूचना एनसीटीई को और विश्वविद्यालय को दी जा चुकी है।
हमारा कॉलेज अरेरा एजुकेशन सोसाइटी द्वारा संचालित है, वहां नया भवन का निर्माण हो चुका है।
2015 में भी हमने शिफ्टिंग के लिए अप्लाई किया था, लेकिन उन्होंने शिफ्ट रिपोर्ट नहीं दी।
उसके बाद हमने विगत वर्ष हमें मालूम पड़ा कि वो नहीं प्रक्रिया हुई तो हमने 2022 में दोबारा यूनिवर्सिटी में सूचना दी
और एनसीटीई कार्यालय में नवंबर 2022 में 1,77,000 का डीडी शिफ्टिंग के लिए डाला हुआ है।
अंडर प्रोसेस है और हमारा महाविद्यालय पूरी तरह वहां बनके तैयार है।
यहां से पूरा सामान, शिफ्ट वगैरह सब वहीं हो चुका है।
यहां केवल ऑफिस को कोई आता है, पता आता है, एड्रेस, चिट्ठी आती है,
इसलिए हमने एक कार्यालय के रूप में एक स्टाफ को यहां छोड़ रखा है।
दलील है कि कॉलेज शिफ्टिंग की प्रक्रिया में था, लेकिन सवाल फिर वही है,
अगर कॉलेज किसी और जगह चल रहा था तो विश्वविद्यालय में दर्ज पता क्या था?
छात्रों को क्या बताया गया?
नियामक संस्थाओं ने किस आधार पर अनुमति दी?
और क्या कोई कॉलेज पहले छात्रों को प्रवेश देकर बाद में पता बदलने की प्रक्रिया पूरी कर सकता है?
सीहोर में एक ही कैंपस में बीएड के तीन कॉलेज चल रहे हैं, लेकिन छात्र एक भी नहीं दिखे।
अब इन जमीनी तस्वीरों को बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के दस्तावेजों से मिलाइए।
विश्वविद्यालय के अधीन कुल 129 बीएड कॉलेज हैं, इनमें दो सरकारी और 127 निजी कॉलेज हैं।
कार्यपरिषद के निर्देशों पर निजी कॉलेजों का निरीक्षण कराया गया।
निरीक्षण में 25 कॉलेजों में कमियां मिलीं।
पांच कॉलेजों में गंभीर गड़बड़ियां पाई गईं।
दो कॉलेज अपने पते पर नहीं मिले।
तीन कॉलेज ऐसे पाए गए जहां बीएड पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय में पंजीकृत पते पर नहीं मिले।
मध्य प्रदेश में 600 से अधिक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों में बीएड की 58,000 से अधिक सीटें हैं।
हर साल करीब 47-48 हजार विद्यार्थी इन कॉलेजों में प्रवेश लेते हैं।
सरकारी कॉलेजों की संख्या बेहद कम है और अधिकांश सीटें निजी संस्थानों में हैं।
फीस कई जगह सालाना ₹30,000 या उससे अधिक बताई जाती है।
मध्य प्रदेश नर्सिंग कॉलेजों, पैरामेडिकल कॉलेजों के मामले में पहले ही सवालों में घिर चुका है।
अब बीएड कॉलेजों का ये मामला उसी तरह की आशंका पैदा कर रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि नर्सिंग में मरीजों की जान का सवाल था, यहां बच्चों की शिक्षा और आने वाली पीढ़ियों का सवाल है।
भोपाल से कैमरा पर्सन रिज़वान खान के साथ अनुराग द्वारी और अजय शर्मा की रिपोर्ट, एनडीटीवी।
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