Analysis of Non-Violent Movements in India

मुझे लिटरली हंसी आती है जब भी कोई कहता है कि इंडिया में भी ना नेपाल और बांग्लादेश जैसा जेन-ज़ी रेवोल्यूशन होना चाहिए।

क्योंकि इससे ज़्यादा बेवकूफ़ी की बात हो ही नहीं सकती।

इससे साफ़ पता चलता है कि ना आपको दुनिया की ख़ैर-ख़बर है और ना ही आपको इतिहास पता है।

और ये मैं नहीं, ख़ुद नेपाल और बांग्लादेश कह रहे हैं।

अभी जुलाई में काठमांडू में क्या चल रहा है?

वही जेन-ज़ी जो 10 महीने पहले सड़क पर उतरी थी, 76 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, सरकार गिराई थी, वो आज फिर सड़क पर है।

किसके ख़िलाफ़? उसी बालेन शाह के ख़िलाफ़ जिसे उसने ख़ुद पीएम बनाया था।

चार महीने भी नहीं हुए और नारा वही है कि इस्तीफ़ा दो।

फिर ढाका को देख लीजिए।

जिस जेन-ज़ी ने हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर किया, 1400 लोगों ने जान गंवाई,

उसके स्टूडेंट्स आज हाईवेज ब्लॉक कर रहे हैं और नए एजुकेशन मिनिस्टर का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं।

एक student leader से जब पूछा गया कि पुरानी सरकार और नई सरकार में क्या फ़र्क है, तो उसका जवाब था, "Both are the same."

और यही प्रॉब्लम है किसी भी हिंसक अपराइजिंग की।

तख्तापलट करना बहुत आसान होता है लेकिन सिस्टम बदलना बहुत मुश्किल।

और सरकारें ये बात जानती हैं।

जैसे ही आप कानून अपने हाथ में लेते हो, आप स्टेट को लेजिटिमेट रीज़न दे देते हो पूरे मूवमेंट को कुचलने का।

इसलिए सरकारें हिंसक मूवमेंट से नहीं डरतीं।

अगर वो डरती हैं तो शांतिपूर्ण आंदोलनों से।

क्यों? डेटा को सुनिए।

हार्वर्ड की पॉलिटिकल साइंटिस्ट एरिका चेनोवेथ ने 1900 से लेकर 2006 तक के पूरी दुनिया के 323 मूवमेंट्स का डेटा खंगाला।

शांतिपूर्ण आंदोलन 53% टाइम्स जीते।

और वायलेंट मूवमेंट्स सिर्फ़ 26%, आधे से भी कम।

और एक ऐसा पैटर्न मिला जिसे आज लोग 3.5% रूल कहते हैं।

जिस मूवमेंट में देश की 3.5% आबादी शांतिपूर्ण तौर से आंदोलन करती है, वो मूवमेंट कभी फेल नहीं हुआ, एक बार भी नहीं।

और जिन देशों में बदलाव नॉन-वायलेंट तरीके से आया, वहां डेमोक्रेसी के टिकने के चांसेस कई गुना ज़्यादा थे।

और इससे बड़ी आयरनी क्या होगी कि मुझे ये बात गांधी के देश में बोलनी पड़ रही है।

वही गांधी जिनके तरीकों से मार्टिन लूथर किंग ने अमेरिका में अश्वेतों को बराबरी का हक दिलवाया।

जिनकी प्लेबुक का इस्तेमाल करके पोलैंड में मजदूरों की एक यूनियन सॉलिडेरिटी ने बिना हथियार उठाए सोवियत एम्पायर में दरार डाल दी।

फिलीपींस में 20 लाख लोग निहत्थे हाईवे पर उतरे और तानाशाह मार्कोस को चार दिन में देश छोड़ना पड़ गया।

ज़्यादा दूर हम क्यों जाएं?

1975 का इंडिया देख लीजिए, देश में इमरजेंसी लगी, डेमोक्रेसी ख़त्म हो गई।

और उसे हटाया किसने? किसी बंदूक ने नहीं, जेपी के उस आंदोलन ने जिसने जेल जाना चुना, पत्थर उठाना नहीं।

और उसी मूवमेंट से निकले लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और अरुण जेटली जैसे नेता।

आज की आधी राजनीति एक नॉन-वायलेंट मूवमेंट की देन है।

इसलिए ये भूल जाइए कि सरकार को किसी जेन-ज़ी रेवोल्यूशन से डर लगता है।

किसी भी सरकार को अगर डर होता है तो सिर्फ़ एक चीज़ का - गांधी रेवोल्यूशन का।

End of transcript · 520 words

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