Critique of Religious Donations
ये देखिए जरा।
मैं अपने हिंदू भाइयों से सिर्फ एक बात बोलना चाहता हूँ।
तुम मंदिरों में चंदा देना बंद कर दो और दान पत्र में पैसे डालना बंद कर दो।
पंडित खुद बोल देगा यहाँ कोई भगवान नहीं है।
अगर दान बंद होने से भगवान खत्म हो जाते,
तो पूरा जीवन जंगलों में तपस्या करने वाले ऋषि-मुनि किसकी तपस्या करते थे? तुम्हारी?
भगवान श्रद्धा से हैं, चढ़ावे से नहीं।
तुम्हारी सोच में भगवान और पंडित का फर्क ही खत्म हो गया है।
मंदिर दान से चलता है, भगवान दान से नहीं चलते।
दान मंदिर के रखरखाव के लिए होता है, भगवान की मौजूदगी साबित करने के लिए नहीं होता।
अगर पैसे से ही भगवान साबित होते, तो सबसे बड़े भक्त अरबपति होते, संत-महात्मा नहीं होते।
तुम भगवान को नहीं, मंदिर की व्यवस्था को भगवान समझ बैठे हो।
अपनी सोच संभालो।
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