Critique of Government and Democracy
सुबह जब मैं उठा ना सर अपनी झोपड़ी में, फोन खोला तो ऐसा लगा कि ये सरकार...
...मतलब पूरी तरीके से तानाशाही पर उतर गई है।
मैं कहता हूँ लोकतंत्र में ना अहंकार नहीं संवाद होना चाहिए और संवाद के दरवाज़े दोनों तरफ से खुले होने चाहिए।
अगर यही सरकार एक नारियल पानी लाती, यूपीए ने अन्ना जी को नारियल पिला दिया...
...इंद्रा जी ने इनके पिताजी को पिला दिया...
...महात्मा गांधी जी ने, महात्मा गांधी को अंग्रेजों ने पिला दिया सर।
तो ये सरकार भी एक संवाद का रास्ता अपना सकती थी और उनके सम्मान, सम्मान...
...संविधान की शपथ में ना गरिमा शब्द का, व्यक्ति की गरिमा राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित...
...व्यक्ति बैठा था 20 दिन से हंगर स्ट्राइक पे इस देश की लाचार शिक्षा व्यवस्था को लेके।
वो क्या मांग रहा था? ये नहीं कह रहा था कि 200 गज का लुटियन दिल्ली में कोई प्लॉट काट दीजिए, राज्यसभा की सीट दे दीजिए या मोदी मंत्रिमंडल में कोई पद दे दीजिए। वो ये कह रहा था...
...इस लाचार शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कीजिए और जिम्मेदारी तय कीजिए, इस्तीफ़ा दीजिए। कोई बड़ी मांग नहीं थी।
जिस तरीके से नए-नए वाले दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार जी आए और उन्होंने...
...एक पुलिसिया डंडे और जूते से एक खूबसूरत लोकतंत्र को कुचलने की जो कोशिश करी, उसके वो बधाई के पात्र हैं। आज मोगैंबो बहुत खुश होगा, उनके दरबार में उनको 100 नंबर मिले।
समझ रहे हैं?
जब आदमी हताश और निराश हो जाता है ना तो नीरज की एक लाइन कह रहा हूँ सर।
सपन झड़े फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गया सिंगार सभी बाग के बबूल से।
हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे, कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
नींद भी खुली ना थी कि धूप ढल गई, पाँव भी उठे ना थे कि ज़िंदगी फिसल गई, पात-पात झड़ गए, शाख-शाख जल गई, चाह तो निकल सकी ना पर उमर निकल गई।
समझिए सर इस दर्द को, इस तरफ, इस...
क्या सोच रहा है देश? नीरज ऐसे नहीं लिख रहे हैं। नीरज को कोई ख्वाब नहीं आया। नीरज सोच रहे हैं कि कितने वक्त आए, गए, कुछ अच्छे, कुछ बुरे, कुछ लोग मेरे साथ थे, आज मेरे हिस्से में धूल और गुबार आई है। नीरज का कहने का मतलब ये है।
तो हमारा कहने का मतलब है कि लोकतंत्र में...
...असहमत रखना कोई अपराध नहीं है।
भारतीय संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
ये लोकतंत्र सिमटते जा रहा है।
मैं जंतर मंतर पे ऐसे भाग के आया कि जब कपिल देव जी ने कहा ना मुझे पीटा और वो रोने लगे...
...मैं कहा यार मुझे भी पीटना चाहिए। मेरे शरीर की मांसपेशियां मेरी आत्मा से लड़ने लग गईं कि ऐसे खड़े हो, कैसे बैठे हो झुकी गर्दन? चलो यार...
...पिटाई खाएंगे दिल्ली पुलिस की। नए-नए वाले कमिश्नर आए हैं, बड़े जोश में हैं।
बहुत बड़ी व्यवस्था और ताकतवर डंडों और बड़ी व्यवस्था उनकी, बहुत मारेंगे। चलो मार खाएंगे उनकी।
ये नहीं है, लोकतंत्र का ये रास्ता नहीं है। लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए।
कोई आपसे सहमत हो या ना हो, टेबल दोनों के लिए है। आइए बात करते हैं।
कुछ गलतफहमी है तो उसे दूर करते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है।
लेकिन किसी को किसी के...
...बिस्तर को उठाना, आए, उठाया, कपड़ा ढका, ले गए और मीडिया में खबर चला दी, 'हेडलाइंस: वांगचुक को उठा लिया।'
आतंकवादी था?
बदमाश था?
गुंडा था? क्या था? इस देश का महान पर्यावरण एक्टिविस्ट था।
शिक्षाविद था, दुनिया का सम्मान नागरिक था।
कितना आविष्कार किया भारतीय सेना के लिए, देश के लिए।
महान साइंटिस्ट था। उठा लिया, उठा लिया, उठा लिया। इस आंदोलन से, तमाम आंदोलन से हमारी आत्मा जुड़ जाती है सर।
हम जन संघर्ष से पैदा हुए लोग हैं।
हमें स्कूल और किताबों का ज्ञान नहीं है हमारे पास। जो बोल रहे हैं वो जीवन से जुड़ा हुआ है। आत्मा रो पड़ी सर।
रो पड़ी सर।
समझ रहे हैं? जब हम इस line को पढ़ते हैं कि 'वी, द पीपल ऑफ़ इंडिया'...
...हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए...
...तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता...
...प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए...
...तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा, व्यक्ति की गरिमा, व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए...
...दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
फिर इतनी बड़ी आबादी आज अपनी मानवीय जीवन कैसे जी रही है?
सभी की तो बात करी गई थी।
सभी की तो बात करी गई थी, सभी की भलाई की बात करी गई थी। शिक्षा में, राजनीतिक में, सामाजिक स्तर पे, धार्मिक स्तर पे, किसी भी स्तर पे किसी को नहीं छोड़ा गया।
फिर इस भारत के शक्ल देखो, इतनी बड़ी आबादी नर्क की जीवन जी रही है।
सारी दुनिया के पटल पे दौड़ती अर्थव्यवस्था भारत, चमकता सितारा है, लेकिन उसके विपरीत बड़ी कंडीशन खराब है।
आप ही तो एक देश और एक राष्ट्र, एक कानून की बात करते हैं। पूरे देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रमिक कानून, अलग न्यूनतम मजदूरी है। कईयों को एक नहीं मिलती, जहाँ लागू है वहाँ भी नहीं मिलती।
आप पूरी तरह से नौजवानों को इस डेंजर में फेंक रहे हैं। मैं अपनी असहमति रखता हूँ।
बोलूँगा। आज मेरी ज़बान कपकपा रही है, पता नहीं।
बहुत बोलता हूँ सर मैं, लेकिन कहते हैं ना...
...इतना भी तोड़िए मत लोगों को, इतना कमज़ोर मत बनाइए।
End of transcript · 930 words