अधूरी मोहब्बत और यादों को जाने देने की शायरी
हम कभी न मिलते तो अच्छा होता
दूर ही रहते तो अच्छा होता
जेब खाली थी दिल की मेरी
तुम बाज़ारों में न बिकते तो अच्छा होता
अच्छा होता अगर ये नज़रें कभी टकराती ही न
लेकिन इस मोहब्बत के आगे कभी किसी की चली है क्या?
ये मोहब्बत तो बस ज़ख्म ही ज़ख्म देती है
इंसान चला जाता है और बस उसकी याद रह जाती है
शायद साथ यहीं तक का हो, सदा का नहीं
शायद वो बस चाहत हो, प्यार नहीं
शायद, शायद के खेल में
तुम खुद को हार के आना
यादों को दफना कर सारी
तुम उसको जाने देना
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