जमात-ए-इस्लामी क्या है? दीन का निज़ाम और मसलकी बँटवारा
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जमात इस्लामी क्या है? जमात इस्लामी दीन की क़ामत की तेहरिक है। यानी दीन को एक निज़ाम हम समझते हैं और इसलिए समझते हैं कि अल्लाह ने दीन को निज़ाम बनाया है। क़ुरान का
मतलब ही यह है कि यह महज पढ़ने की नहीं, इसका निज़ाम नाफ़िज़ होने के लिए है। आदल का निज़ाम, इंसाफ का निज़ाम, इंसानों पर से इंसानों की हकमियत को खत्म करने का निज़ाम।
इस्लाम के बारे में भी वक़्त गुजरने के साथ-साथ उसके कई edition निकाल दिए लोगों ने। बाज़ ने कहा, "बस ख़ैर के चार काम कर लो, यह इस्लाम है।" बाज़
ने कहा, "यह वाज़ और नसीहत कर लो, यह इस्लाम है।" बाज़ ने कहा, "यह ज़िक्र और अज़कार पढ़ लो, यह इस्लाम है।"
बाज़ ने कहा, "पानी की सबील लगा लो, plant लगा दो, यह इस्लाम है।" और बाज़ ने कहा, "इस्लाम तो जो भी है, मेरा मसलक बहुत अहम है। जो मेरे मसलक पर नहीं, वो इस्लाम के दायरे से ख़ारिज
है।" इस्लाम के नाम लेने वालों में भी बड़े अज़ीम लोग भी गुजरे हैं जिन्होंने ख़िद्मात अंजाम दी है। वो उलेमाए किराम, जो उलेमाए हक थे या हैं, वो हमारे माथे का जुम्मर
हैं। लेकिन एक बड़ी तादाद वो भी है जो दरबार से वावस्ता हो जाती है। वो बड़ी तादाद है जो हुकूमत से मुराद लेती है और वो दीन को बेचने लगते हैं। वो
मसलकों की दुकान लगा लेते हैं। वो फ़िरक़ों की बुनियाद पर इंसानों को तक़सीम कर देते हैं। वो जुज़ियात और फ़रोईयात को कुल से ज़्यादा अहमियत देने लगते हैं। वो छोटी-छोटी बातों पर फतवे
लगाते हैं और
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