मोहन यादव के परिवार की उज्जैन में जमीन खरीद पर सवाल
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मतलब बीजेपी और कांग्रेस के करप्शन में अंतर क्या है?
नेता चमड़ी दोनों की है पर कांग्रेस का करप्शन एक्सपोज़ होता था, बीजेपी का एक्सेप्ट हो गया है।
इंडियन एक्सप्रेस ने एक्सपोज़ किया है मध्य प्रदेश चीफ मिनिस्टर मोहन यादव को, जिनकी फैमिली ने उज्जैन डेवलप होने से पहले ही वहां आधी से ज़्यादा प्रॉपर्टी खरीद ली।
मोहन यादव उज्जैन से ही विधायक हैं, वहां से लंबे समय से बीजेपी के नेता हैं।
हाल ही में ये मध्य प्रदेश के चीफ मिनिस्टर चुने गए थे और इनके अंडर बना था उज्जैन मास्टर प्लान 2035।
मतलब आने वाले टाइम में इनको मध्य प्रदेश में उज्जैन शहर को बड़ा बनाना था।
जैसे यूपी ने नोएडा बनाया, Haryana ने गुरुग्राम बनाया, गुजरात ने गांधीनगर बनाया, ऐसी मध्य प्रदेश की इंडस्ट्रियल सिटी होनी थी उज्जैन।
उसके लिए वहां पर बहुत बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स आने थे, इन्वेस्टमेंट होने थे और इस सब की जानकारी थी वहां के चीफ मिनिस्टर मोहन यादव को।
क्योंकि उससे पहले वो उज्जैन डेवलपमेंट अथॉरिटी के चेयरमैन रहे हैं, वहां के एमएलए रहे हैं, एमपी टूरिज्म भी संभाला, लंबे टाइम के नेता हैं और अब तो चीफ मिनिस्टर थे, तो इन्हें पता था सब कुछ।
अब हो सकता है ये संयोग हो कि इनकी फैमिली ने पिछले एक साल में उज्जैन में करोड़ों-करोड़ों की प्रॉपर्टी खरीदी।
फैमिली रियल एस्टेट में पिछले 12 साल में कुछ 80 एकड़ की प्रॉपर्टी खरीदी थी, लेकिन पिछले एक साल में लगभग 168 एकड़ प्रॉपर्टी खरीदी, 137 प्लॉट, जो कुछ तो बेच भी दिए गए।
और ये जितनी भी प्रॉपर्टी खरीदी गई, ये उज्जैन मास्टर प्लान के अकॉर्डिंग बिल्कुल प्राइम लोकेशंस में खरीदी गई।
कहीं एग्रीकल्चर से कमर्शियल प्रॉपर्टी, कहीं रेसिडेंशियल प्रॉपर्टी, कहीं टाउनशिप, वो जगह जहां पर पहले खेत थे लेकिन आगे जाकर हाईवे निकलने थे, वहां पर सरकारी, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट आना था, बिल्कुल प्राइम-प्राइम लोकेशन।
सैकड़ों एकड़ ज़मीन जो आज लाखों की है, कल करोड़ों की होती, करोड़ों से अरबों की होती, इनकी फैमिली ने खरीद ली।
और जब फैमिली बोल रहे हैं, तो एक्सप्रेस इन्वेस्टिगेशन है पूरा फ्रंट पेज, सब लोग।
इनकी वाइफ, इनका बेटा, इनकी बहू, इनका भाई, उनकी बीवी, चाचा, भतीजे, क्लोज़ से लेकर एक्सटेंडेड फैमिली, सबका नाम आया है।
और ये सारा सरकारी डेटा मध्य प्रदेश लैंड रिकॉर्ड्स से निकाला है इंडियन एक्सप्रेस वालों ने।
इनके घरवालों के नाम किसने, कितनी, कहां ज़मीन खरीदी, सब कुछ सामने लाकर रख दिया है।
मुख्यमंत्री भी एक सरकारी कर्मचारी होता है, तो एक सरकारी पद का इस्तेमाल करके सरकारी कर्मचारी के घरवाले इतने बड़े लेवल पर प्रॉपर्टी की हेर-फेर करें, क्या ये कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट नहीं है?
ये पूरी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस के अखबार में छपी है, जय मजूमदार ने इसको लिखा हुआ है।
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