इस्लामी इंकलाब, अंबिया और कामयाबी का असली पैमाना
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मैं फिर कहूंगा इस्लामी इंकलाब का वादा आपसे किया किसने है?
अल्लाह ने किया है, उसके रसूल ने किया है। मौलाना मौदुदी ने किया है। नहीं किया किसी ने वादा।
"वमा अलैना इल्लल बलागुल मुबीन" आप पर यह लाजिम है।
इसी का सवाल किया जाएगा। इंकलाब नहीं आएगा तो क्या करेंगे?
नाकाम हो गए हम, नहीं नाकाम। मौलाना मौदुदी ने खुद अपने Literature में लिखा है कि कितने अम्बिया ऐसे थे कि जिनकी वजाहे दुनियावी हुकूमतें कायम नहीं हुई।
बल्कि ज्यादातर की नहीं हुई है। चंद हैं जिनकी हुकूमतें दुनियावी तौर पर आप कह सकते हैं, मुल्कों पर कायम हुई हैं या अक्वाम पर कायम हुई हैं।
कई अम्बिया ऐसे थे कि जो कत्ल कर दिए गए, सूलियों पर चढ़ाए गए, आरो से चीरे गए। कई अम्बिया ऐसे हैं कि वो उनकी उम्मतें बहुत कम लोगों पर मुश्तमिल थी। तो इससे क्या साबित होता है कि वो नाकाम थे? नहीं। असल चीज यह है कि आप हक के मुताबिक अपनी सारी जिंदगी गुजारीए और आपको जब मौत आए तो आप हक पर मौजूद हो।
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